Monday, 30 September 2013

शहीदेआज़म पर कुछ हालिया टीपें

आजकल के हालात पर भगत सिंह का बयान ?

''.......भारत साम्राज्यवाद के जुए के नीचे पिस रहा है. इसमें करोड़ों लोग आज अज्ञानता और ग़रीबी के शिकार हो रहे हैं. भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या जो मज़दूरों और किसानों की है, उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है. भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है. उसके सामने दोहरा ख़तरा है - विदेशी पूंजीवाद का एक तरफ़ से और भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ़ से ख़तरा है. भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ रोज़ाना बहुत से गठजोड़ कर रहा है.

भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से विश्वासघात की कीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है. इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएं अब सिर्फ़ समाजवाद पर टिकी हैं और सिर्फ़ यही पूर्ण स्वराज और सब भेदभाव खत्म करने में सहायक हो सकता है.''

( हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन के घोषणा पत्र का एक अंश , समझा जाता है कि इस घोषणा- पत्र को भगत सिंह के निर्देशों के अनुसार करतार सिंह के छद्मनाम से भगवतीचरण वोहरा ने लिखा था.)


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भगतसिंह किस विचारधारा के थे , इसके बारे में उन्होंने खुद लिखा है . किसी भ्रम की गुजाइश नहीं है .हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम अंतर्राष्ट्रीयतावाद भगतसिंह की विचारधारा नहीं थी . इन विचारों का समर्थन करना भगत सिंह , आज़ाद और अशफाक की शहादत के साथ सीधी गद्दारी है . उनके विचारों और उनके सपनों और उनकी शहादत से अलग कर के भगत सिंह की जयजयकार करना उन्हें वैचारिक फांसी देने की समान है .

---''हम वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं. हम वर्तमान समाज को पूरी तरह से एक नये सुसंगठित समाज में बदलना चाहते हैं और इस प्रकार मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असंभव बनाकर सभी के लिए सभी क्षेत्रों में पूर्ण स्वतंत्रता के हम पक्षधर हैं .
जब तक सारा सामाजिक ढांचा बदल नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवाद की स्थापना नहीं हो जाती तब तक हम समझते हैं पूरी दुनियां एक तबाह कर देने वाली प्रलय संकट में है, क्योकि हमारा विश्वास है की साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साजिश के अलावा कुछ नहीं है ,साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य और राष्ट्र के द्वारा राष्ट्र के शोषण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है.
वास्तव में साम्राज्यवादी शक्तियां अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु न सिर्फ न्यायालयों एवं कानूनों का कत्ल करते हैं अपितु भयंकर जन संहार और युद्ध जैसे खौपनाक अपराध करने से भी नहीं चूकते हैं. जहाँ कही लोग इनकी नादिरशाही शोषण की निति का विरोध करते है या फिर उन्हें मानने से इनकार कर देतें हैं तो ये निरपराधियों का भी खून बहाने में भी संकोच नहीं करते हैं और शांति व्यवस्था की आड़ में ये स्वयं शांति भंग करते हैं!''

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शेर तो एक ही था . शेरे पंजाब लाला लाजपत राय . सौन्डर्स की हत्या लाला पर हुए हमले का बदला चुकाने के लिए हुई थी . इस कार्रवाई में भगतसिंह शरीक थे . लेकिन भूलना न चाहिए कि असहयोग की नाकामी के बाद 1924के चुनावों के समय लाला का झुकाव हिंदूवादी राजनीति की ओर हो चला था . युवा भगत सिंह ने इस विचलन के लिए लाला की कठोर आलोचना करने में कोई देर न की . 'लॉस्ट लीडर ' शीर्षक लेख में ब्राउनिंग की एक कविता के हवाले से भगत सिंह ने लिखा - चांदी के चंद टुकड़ों के लिए उसने हमें छोड़ दिया ! जो पंजाब का शेर था , वो आज चूहा हो गया . ............................................... 
(आज भगत सिंह होते तो भारत माँ के 'हिंदूवादी ' शेरो के लिए क्या कहते !)

मोदीमंडली मुंह खोलेगी ?

लालू जेल गए . देशभर ने सत्रह साल लम्बी राहत की सांस ली .
न्याय व्यवस्था पर भरोसा लौटा . 
लालू और उन जैसे तमाम सजायाफ्ताओं की सांसदी बचाने को सभी पार्टियों की सहमति से लाया गया लाया गया अध्यादेश राहुल ने फाड़ कर फेंक दिया . याद कीजिए कि बीजेपी और वाम समेत सभी संसदीय पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निष्प्रभावी बनाने के लिए लाये गए विधेयक का समर्थन किया था . 
सजा पा कर सांसदी गंवाने वाले लालू पहले नेता होंगे . इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए उन्हें बधाई. 
लालू के जेल जाने से  मोदीमंडली में भी खुशी की लहर है. होनी भी चाहिए . 
लेकिन मोदीमंडली को खुशी के साथ चिंता भी होनी चाहिए .
आखिर इसी सीबीआइ का प्रेत मोदी के सर पर भी मंडला रहा है .
लेकिन एक प्रेत तो अभी मोदी की गोद में ही बैठा है .
मोदी के प्यारे जलसंसाधन मंत्री बाबू बोकारिया. 
पिछले जून में ही अदालत द्वारा उन्हें 54 करोड़ के अवैध खनन का दोषी ठहराया जा चुका है . 
चूंकि यह सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के ज़रा पहले हो गया था , इसलिए तकनीकी रूप से वे विधान सभा के सदस्य और मंत्री बने रह सकते हैं . कांग्रेस को भ्रष्टाचार का एकमात्र स्रोत बताने वाले मोदी ने इस तकनीकी सुविधा का लाभ उठा कर उन्हें अपने पद पर बनाये रखा है .
अब क्या  मोदीमंडली यह बताने की तकलीफ उठायेगी कि क्या वे नरेंदर 'भाई ' से बोकारिया को बर्खास्त करने का अनुरोध करने का साहस कर पायेंगे ? फेसबुक पर ही सही !

और उसके बर्खास्त न होने की सूरत में यह कहने की हिम्मत कर पायेंगे कि इस से मोदी का भ्रष्टाचार -विरोध प्रहसन मात्र अंतिम रूप से साबित हो जाता है , जो वैसे भी पिछले दस सालों से गुजरात को ''लोकायुक्त -मुक्त '' रखने में सफल रहे हैं ?

आपका समय शुरू होता है अब .
(यह अहवाल http://www.firstpost.com/politics/lalu-verdict-welcome-but-what-about-gujarats-babu-bokariya-1141943.html पर आधारित है )

Sunday, 29 September 2013

अभी तो... - गिरिजेश




अभी तो हूँ वहाँ, जहाँ पता नहीं खबर नहीं,

अभी तो वक्त के मुकाम और भी बदल रहे;
अभी तो दौर-ए-सख्त झेल कर उठाया हाथ है,
व’ हाथ जो मुकाम-ए-वक्त को बदलने जा रहा...

अभी हैं तेज़ आँधियाँ, बगूले ख़ूब उड़ रहे,
अभी तो चीख़ सुन रहा हूँ ख़ूब ज़ोर-ज़ोर से; 
अभी तो हूक उठ रही है ज़ोर से कलेजे से,
अभी तो आँख में गिरी पड़ी है ख़ूब धूल भी...

अभी तो काफ़िला बिखर गया है दूर-दूर तक,
अभी तो दोस्त भी सभी इसी तरह अटे पड़े;
अभी तो हाल कहने का भी वक्त आ सका नहीं,
उन्हें बुला रहा अभी, उन्हें बता रहा अभी...

करीब और आने के बहुत करीब आ चुके,
अभी कई मुकाम सर करेंगे, तब बढ़ेंगे हम;
खड़े नहीं रहेंगे हम, अगर जो साथ आ सके,
बढ़ेंगे एक साथ हम, गढ़ेंगे हम, लड़ेंगे हम...

FOR NOW... - Girijesh

I am now, where there is no news;
And many points of time changing;
Have just raised a hand facing the worst period,
Hand that is going to change the face of time…

Storms are still sharp, well upshots fly,
Still I am to listen loud screams;
Sever pain is screwing up so hard in liver,
Too much dust is filled in the eyes...

The caravan is shattered far away,
All friends too are littered with;
Still time has not arrived to tell the condition;
Still calling them, telling them now...

We have come very close to coming closer,
Many obstacles are yet to conquer, we will move then; 
We will not stand, if we could come up with,
Together we will move, we will create, we will fight...

19.5.13.

Saturday, 28 September 2013

Akbar Rizvi - क्रांति ऐसे नहीं आती




Mohan Shrotriya - "बात में #दम है ! पढ़ लेंगे, तो उम्मीद है, आप भी सहमत होंगे. #अकबर का अंदाज़े बयां जमेगा, आपको भी. तो पढ़ लीजिए...

*भगत सिंह को सप्रेम समर्पित, कांतिहीन और ढपोरशंखी क्रांति-पुराण का पारायण
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क्रांति कोई चूँ-चूँ का मुरब्बा नहीं
क्रांति डालडा का खाली डब्बा नहीं
क्रांति अद्धा, पौव्वा या सिक्का भी नहीं
क्रांति उद्घोष या नारों का नाम नहीं
झंडे को मीनार पर टाँगने का नाम नहीं
क्रांति कोई मादक गंध भी नहीं है कि
फूल से झड़ते शब्दों पर कोई हो जाए क़ुर्बान!

क्रांति का अर्थ है चेतना का जगना
क्रांति का अर्थ है विद्रोह का सुलगना
क्रांति का अर्थ है लोहे का अंगार बनना
लोहार की भाथी में डूबना और गलना
क्रांति का अर्थ कंधा और बंदूक की तलाश नहीं
क्रांति का अर्थ कंधा और बंदूक बनना है!

क्रांति उतावली में नहीं होती
क्रांति नारों की रूमानियत में नहीं होती
क्रांति महज झंडा टाँगने में नहीं होती
क्रांति सभाओं-सेमिनारों के शब्द फांकने में नहीं होती
क्रांति जंगल या रेगिस्तानों में नहीं होती

क्रांति के लिए तैयार करनी होती है ज़मीन
समाज में बीजनी होती है विचारों की फ़सल
रोटी की आपाधापी में बौराई भीड़ को संभाल
बनाना पड़ता है चेतन मानव-समूह
क्योंकि तभी जड़ होता है मज़बूत
बहुत बाद में नारे और झंडे आते हैं काम

और सुनो अगर इतना धैर्य नहीं है
नहीं है इतना सामर्थ और जीवट
नहीं है इतना विवेक तो मस्त रहो
तुम्हारी क्रांति है ख़ाली डिब्बा
दिन-रात बजाते रहो, बजाते रहो

*अकबर रिज़वी,  क्रांति ऐसे नहीं आती

https://www.facebook.com/akbarizwi


Thursday, 26 September 2013

प्रो. लालबहादुर वर्मा - भगत सिंह के नाम एक पत्र .....




प्यारे दुलारे भगत,
ख़त में एक दूरी तो है पर यह ख़त हम तुम्हारे मार्फ़त खुद को लिख रहे हैं - तुम से जुड़कर तुम्हे अपने से जोड़ रहे हैं.....

तुमे हम क्या कहकर पुकारे यह तय करना बाकी है , क्योकि तुमसे जन्म का रिश्ता तो है नहीं कर्म का रिश्ता है और तुम्हे जो करना था कर गए , हमें जो करना है वह कितना कर पाते है यह इसे भी तय होगा की हम तुम्हे कैसे याद करते हैं .बहरहाल इतना तो तय ही है की तुम्हें ''शहीदे आज़म'' कहना छोड़ दिया है . इसमें जो दूरी , जो परायापन था वह पास आने से रोकता रहा है . तुम्हें अनूठा ,असाधारण ,निराला बनाकर हम बचते रहे की तुम जैसा और कोई हो ही नहीं सकता . आखिर क्यों नहीं हो सकता? आखिर तुमने ऐसा क्या किया है जो दूसरा नहीं कर सकता ? तुमने देश से प्रेम किया , समाज को बदलना चाहा . घर परिवार को समाज का अंग मान समाज को आज़ाद और बेहतर बनाना चाहा , आखिर तभी तो घर परिवार आज़ाद और बेहतर हो सकते थे ..तुमने अनुभव और अध्ययन से जाना और लोगों को बताया कि शोषण और जुल्म करने वालों में देशी-विदेशी का अंतर बेमानी होता है , तुमने कितनी आसानी से समझा दिया कि तुम नास्तिक क्यों हो गए थे ? तुमने कुर्बानी दी पर कुर्बानी देने वालों की तो कभी कमी नहीं रही है .आज भी कुर्बानी देने वाले हैं .

हाँ तुम्हारी चेतना का विकास और व्यापक पहुँच असाधारण थी , 
पर कोई करने आमादा हो जाय तो ये सब मुश्किल भले ही हो पर असंभव तो नहीं होना चाहिए! पर हाँ , तुम्हारी तरह लगातार अपने साथ आगे बढ़ते जाने का जज्बा और कोशिश तो चाहिए ही .
तुमने जब अपने वक्त को और उसी से जोड़कर अपने को जाना पहचाना . तो हिन्दुस्तान पर बर्तानिया के हुक्मरानों की हुकूमत बेलौस और बेलगाम हो चुकी थी .

आज अमरीकी निजाम उसी रास्ते पर है , वह ज्यादा ताकतवर, ज्यादा बेहया और ज्यादा बेगैरत है . उसे हर हाल में अपनी जरूरतें पूरी करनी हैं .पर दूसरी तरफ दुनिया तो पहले से ज्यादा जागी हुई है . खुद अमेरिका में ही लाखों लोग अपने ही देश में अमन और तहजीबो-तमददुन के दुश्मनों के खिलाफ बगावत पर आमादा हैं .

यह सच है की दुनिया को भरमाने और तरह तरह के लालचों के जाल में फसाकर न घर न घाट का कुता बना देने के ढेरों औजार और चकाचौध पैदा करने वाली फितरतें हैं हुक्मरानों के पास . लोगों को तरह तरह से बाट कर रखने के उपाय हैं पर आम लोग भी तो पहले की तरह भेड़ बकरी नहीं रहे .आज ठीक है कि ज्यादातर लोग सम्मान पूर्वक रोटी दाल भी नहीं खा रहे और पढ़े लिखे लोग रोटी पर तरह तरह के मक्खन और चीज चुपड़ने में ही मरे जा रहे हैं.

पर यह भी तो सच है कि ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो जानने समझने लगे है कि जो कुछ उनका है वह उन्हें क्यों नहीं मिल पा रहा है ? आज आदमी के हक़ छीने जा रहे हैं यहाँ तक की हवा पानी के हक़ भी .. जो कुदरत ने हर किसी को दे रखा है . पर हकों की पहचान भी तो बढ़ रही है . आज इन्साफ की उम्मीद नहीं रही . पर इन्साफ के लिए खुदा नहीं ,इंसान को जिम्मेदार ठहराने की तरकीबें बढ़ रही हैं . इंसान धरती सागर ही नहीं अन्तरिक्ष को भी रौंद रहा है पर उसकी इंसानियत खोती जा रही है . पर साथ ही बढ़ रहा है हैवानियत से शर्म का अहसास , बढ़ रहे हैं भारी पैमाने पर लालच बेहयाई और बर्बरता ..पर क्या गुस्सा नहीं बढ़ रहा?

तो भगत ! हम तुम्हारे अनुयायी नहीं ,तुमसा बनना चाहते हैं बल्कि तुमसे आगे जाना चाहते हैं .क्योकि तुमसा बनने से भी काम नहीं चलेगा . तुम रूमानियत से उबरते जा रहे थे ,पर क्या पूरी तरह ? आज के हालात में भी रूमानियत जरूरी है पर दाल में नमक भर ...

दुखी मत होना यह जानकर कि अब तो सफल होने में जुटे लोगों के लिए तुम प्रासंगिक नहीं रहे . आज़ादी के फ़ौरन बाद शैलेन्द्र ने लिखा था कि ''भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की ,
देश भक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की'' .
मैं जानता हूँ, तुम्हें इतिहास से कितना प्रेम था .इत्मीनान रखना कि अनगिनत लोग तुमसे यानी अपने इतिहास से प्रेम करते हैं . वे इतिहासबोध से लैस हो रहे हैं . तुम्हारी मदद से,इतिहास की मदद से वे दुनिया बदलने पर आमादा हैं .हम पुराने हथियारों पर लगी जंग छुडा उन्हें और धारदार बनायेंगे और लगातार नए नए हथियार भी ढूढते जायेंगे .दोस्त दुश्मन की पहचान तेज करेंगे , हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि तुम आज होते तो क्या क्या करते ? हमें तुम्हारे बाद पैदा होने का फायदा भी तो मिल सकता है . एक भगत सिंह से काम नहीं चलने वाला , हमसब को 'तुम' भी बनना होगा 

यह सब लिख पाना भी आसान काम नहीं था , बरसों लग गए यह ख़त लिखने में , जो कुछ लिखा है उसे कर पाने में तो और भी ना जाने कितना वक्त लगे ....!

तुम्हारा , लाल बहादुर 
इतिहासबोध .

Sunday, 22 September 2013

इंग्लैण्ड के अनुभव बहुत काम आयेंगे स्वामी रामदेव के भविष्य में - श्रीराम तिवारी

".....स्वामी रामदेव को यदि भारत में छह मिनिट के लिये भी पूछताछ के लिये रोक जाये या थाने बुलाया जाये तो गजब हो जायेगा। बाबा रामदेव नारी वेश में ‘मर्कट लीला’ करने लगेंगे। दक्षिण पंथी मीडिया पागल हो जायेगा।....."
इंग्लैण्ड के अनुभव बहुत काम आयेंगे स्वामी रामदेव के भविष्य में - श्रीराम तिवारी
(श्रीराम तिवारी लेखक जनवादी कवि और चिन्तक हैं. जनता के सवालों पर धारदार लेखन करते हैं.)

कल लन्दन के अंतर्राष्ट्रीय हीथ्रो हवाई अड्डे पर इंग्लिश अधिकारीयों ने छह घंटे तक स्वामी रामदेव से पूछ-ताछ की है। भारतीय नजरिये से प्रथम दृष्टया यह सरासर अन्याय और ना इंसाफी है। शायद दो सौ साल तक भारत पर शासन कर चुकने के बाद भी ब्रिटिश शासन और वहाँ के अधिकारियों को यह भली भाँति मालूम नहीं हुआ होगा कि भारत में ‘स्वामियों, बाबाओं, गुरु-घंटालों परजीवी उपदेशकों को विशेषाधिकार है कि कोई उन्हें साधारण आदमी ट्रीट नहीं कर सकता। उनके कृतित्व या उनकी सम्पदा के स्वामित्व में आड़े नहीं आ सकता। भारत में यदि किसी शासन-प्रशासन या जिम्मेदार तंत्र ने इन ‘ बाबाओं’ की थोड़ी सी भी जाँच-परख या उनके खिलाफ आ रही शिकायतों की सुनवाई की तो किसी की खैर नहीं। स्वामी रामदेव को यदि भारत में छह मिनिट के लिये भी पूछताछ के लिये रोक जाये या थाने बुलाया जाये तो गजब हो जायेगा। बाबा रामदेव नारी वेश में ‘मर्कट लीला’ करने लगेंगे। दक्षिण पंथी मीडिया पागल हो जायेगा। संघ परिवार, भाजपा, विश्व हिन्दू परिषद्, ये अखाड़ा - वो मठ - ये गिरी, वो स्वामी सभी मिलकर देश में कोहराम मचाने को सदैव तैयार हो जायेंगे। इसमें उन्हें सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, कांग्रेस, धर्मनिपेक्ष, जनतांत्रिक-विदेशी ताकतें षड्यंत्र करती दिखाई पडने लगेंगी। अब स्वामी रामदेव यदि बिजनेस वीजा की जगह विजिटर वीजा लेकर अपने ‘उत्पाद‘ इंग्लैण्ड में बेचेंगे, तो वो भारत तो है नहीं कि पकड़ा-पकड़ी पर दस जनपथ के खिलाफ गर्दभ वाणी का बेजा इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा कर सकें।

वे भले ही कहें कि मेरे पास गीता-रामायण जैसे संस्कृत साहित्य के अलावा कुछ नहीं तो कौन यकीन करेगा ? जब वे खुद चीख-चीखकर प्रचार कर रहे हैं कि उनके आविष्कारों की गूँज सारी दुनिया में है, उनकी ‘पतंजलि योग अनुसंधान केन्द्र‘ में तैयार की गयीं बेशकीमती आयुर्वेदिक दवाएं अमेरिका, यूरोप और इंग्लॅण्ड में भारी कीमत में खरीदी जातीं हैं। तो इसमें क्या शक है कि वे स्वयम् भी अपने पेटेंट्स उत्पादनों के ब्राण्ड एम्बेसडर बनकर ही तो इंग्लैण्ड गये हैं। अब इंग्लैण्ड में भाजपा या मोदी समर्थक सरकार तो है नहीं जो ‘स्वामी रामदेव, आशाराम, नित्यानंद या जयेंद्र सरस्वती की पाद पूजा करे, उनकी वित्तैष्णा, कामेश्णा, यशेष्णा को तुष्ट करे। स्वामी रामदेव को अपनी इंग्लैण्ड यात्रा से पहले अपनी वास्तविक स्थति को ध्यान में रखकर और यह सोचकर यात्रा करनी थी कि वे जिस देश में पैदा हुये हैं सिर्फ वो ही दुनिया में उनके लिये सबसे ज्यादा मुफीद है। उन्हें श्री-श्री रविशंकर, आचार्य रजनीश उर्फ़ ऒशो, महर्षि महेश योगी और अन्य ‘विलायत रिटर्न’ अपने पूर्ववर्ती असफल स्वामियों, बाबाओं के कटु अनुभवों से भी कुछ सीखना चाहिए था। स्वामी विवेकानन्द ने भारत और हिन्दू धर्म को शिखर पर पहुँचाने के लिये ‘तिजारत’ या झूठ-कपट का सहारा नहीं लिया था। आधुनिक दौर के यायावर-पाखण्डी धर्म प्रचारकों ने भारत का नहीं स्वयम् का कल्याण करने में हिन्दू धर्म को दाँव पर लगाया है।

इसीलिये प्राय: आरोप लगाया जाता है कि भारत में कुछ लोग सिर्फ हिन्दू स्वामियों, बाबाओं और प्रवचन कारों को ही घेरते रहते हैं। अल्पसंख्यक धर्म गुरुओं के भ्रष्टाचार, पापाचार और कदाचार को दबा दिया जाता है। हो सकता है भारत में हिन्दुओं के सापेक्ष अल्पसंख्यकों को कम कुख्याति मिली हो। लेकिन इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं कि किसी खास धर्म-मजहब के ‘मज़हबी लीडर‘ पाक-साफ़ हैं। कौन कहता है कि केवल हिन्दू धर्म के बाबा स्वामी या संत ही बड़े बदमाश हैं? धर्म-मजहब कोई भी हो उसका मूल आधार अंध-श्रद्धा ही है। सभी धर्मों-मजहबों-पंथों-दर्शनों में वक्त के साथ गिरावट आयी है। वैसे भी दुनिया के तमाम धर्म-मजहब और उनके धार्मिक ग्रन्थ सिखाते हैं कि “केवल उनका धर्म-पंथ, मजहब ही श्रेष्ठ है, उस पर ही यकीन करो, उसके संस्थापक पर ही यकीन करो, बाकी के धर्म मजहब सब झूठे हैं”। हिन्दू धर्म में इतनी कट्टर अवधारणा नहीं है। बल्कि केवल हिन्दू धर्म ही है जो सिखाता है कि :-

“एकम् सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”
(सत्य एक ही है, संसार के सभी धर्म-मजहब के लोग उस परमात्मा या सत्य को अपनी भाषा या वाणी से उद्घोषित किया करते हैं)

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग्भावेत्”
(सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी में समग्र दृष्टि हो और सभी के दुखों का निवारण सभी मिलकर करें)

बहुत शर्मनाक है कि इस दौर के हिंदुत्ववादियों-गुरु घंटालों और धंधेबाज स्वामियों ने अपने निहित स्वार्थ के लिये ‘हिन्दू धर्म‘ की वास्तविक छवि को धूमिल करने का काम किया है। हिन्दू धर्म के उच्चतम मूल्यों और सिद्धान्त पर रमण करने वाले योगी महात्मा तिजारत-व्यापार नहीं किया करते। अन्य धर्मों में यदि ये मूल्य नदारत हैं तो यह उस धर्म-मजहब के अनुयाइयों के चिन्तन का विषय है। सच्चे हिन्दू लोग सिर्फ इसलिये परिस्थितियों को स्वीकारने के लिये नहीं बैठे कि ये तो सभी संस्कृतियों और धर्मों-मजहबों की दुर्गति का दौर है। बहरहाल यहाँ भारत में तो हिन्दू धर्म के बाबाओं-स्वामियों का ही ज्यादा बोलबाला है अतएव उन्हीं की पूजा और उन्हीं की आलोचना का दौर है। गैर हिन्दू धर्म के बारे में उनके अनुयायी ही फैसला करेंगे कि क्या उचित है ? क्या अनुचित है ?

बेशक हिन्दू धर्म के स्वामी-बाबा और धर्माचार्य तो ‘सत्पथ’ पर नहीं चल रहे हैं। चंद सच्चे साधू-संतों को छोड़ अधिकाँश ‘धर्म-प्रचारक' मठाधीश केवल www याने [welth, women, wine] में रमण कर रहे हैं। वे वर्तमान संप्रग सरकार में अपने कर्मों के कारण न केवल बदनाम हो रहे हैं बल्कि जेल भी जा रहे हैं, इसीलिये वे पाखंडी ढोंगी धर्मगुरु-कट्टरतावादी हिंदुत्व की राजनीति करने वालों के कट्टर प्रचारक बन चुके हैं। अधिकाँश परजीवी धन्धेबाज, चालाक और धूर्त-ज्योतिषी-कर्मकांडी इस फिराक में रहते हैं कि राज्यसत्ता का अविरल सम्मान और समर्थन उन्हें मिलता रहे। वे केवल ‘राम-नाम जपना - पराया माल अपना’ के अभिलाषी हैं।

आशाराम, निर्मल बाबा, कंधारी बाबा, ये आश्रम वो डेरा और न जाने कितने नामी-गिरामी अपराधी हैं जो निरीह जनता को बेवकूफ बनाकर दौलत के ढेर पर बैठे हैं। स्वामी रामदेव इन सब में नंबर वन हैं। राजनैतिक भ्रष्टाचार को समाप्त करने, विदेशी बेंकों से काला धन वापिस लाने की दुहाई देने वाले बाबा रामदेव का राजनैतिक सरोकार तो समझ में आता है किन्तु धर्म अध्यात्म और ‘दर्शन’ से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे अब व्यक्ति नहीं संस्था हो चुके हैं। वे योग गुरु, के बहाने सरकार से और समाज से अपने व्यापार के लिये, तिजारत के लिये विशेषाधिकार की आकाँक्षा रखते हैं। कांग्रेस और यूपीए से अब उन्हें कोई उम्मीद नहीं है इसलिये उगते सूरज - नरेन्द्र मोदी का “नमो-जाप” शुरू कर दिया है बाबा रामदेव ने। लेकिन भाजपा, एनडीए या मोदी के सहयोग से ये सुविधा उन्हें शायद भारत में ही मिल सकती है। इंग्लैण्ड में या अमेरिका में ‘संघ परिवार’ की ताकत अभी सीमित है। अमेरिका में जब ईसाई जॉर्ज फर्नाडीज के कपड़े उतरवा लिये जाते हैं और मुसलमान शाहरुख खान को अपमानित किया जाता है तो बाबा रामदेव कुछ नहीं बोलते। लेकिन जब उन पर बीतती है तो ठीकरा कांग्रेस या ‘धर्मनिरपेक्ष’ जमात पर फोड़ देते हैं। गनीमत है स्वामी रामदेव की इंग्लैण्ड में लंगोटी तो सलामत रही। रामदेव को सोचना चाहिए कि “संतों का सीकरी सों काम” यदि राजनीति ही करनी है या धंधा ही करना है तो योग का ढोंग छोड़ना होगा। विशुद्ध व्यापार के लिये तो अंग्रेज दुनिया में वैसे ही बहुत मशहूर हैं। आशा है कि स्वामी रामदेव जी को इंग्लैण्ड से जो कुछ भी अनुभव मिले वे उनके भविष्य में अवश्य काम आयेंगे।
Hastakshep.com :

जनरल वी के सिंह - यक रहैन ईर यक रहैन वीर




आदरणीय पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह जी, 
जैसा कि आप जानते हैं मैं बड़े लोगों को चिट्ठियाँ लिखता हूँ । दो दिनों से बोख़ार के कारण बेचैन मन के लिए समय व्यतीत करने का अच्छा तरीक़ा भी है । आप जानते ही हैं कि जब से पत्रकारिता शोरगुल वाली हो गई और दर्शक तू तू मैं मैं की चौपाल में टीवी से लेकर ट्वीटर तक पर मज़ा ले रहे हैं मैं घर पर समाचार माध्यमों से दूर रहता हूँ । आज जब इंडियन एक्सप्रेस में आपके बारे में ख़बरें पढ़ीं तो मैं गूगल करने लगा । कहाँ से शुरू करूँ । लिख रहा हूँ स्नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें समझाने को, खत पढ़कर चल मत आना हमीं को उल्टा समझाने को ! 

" भारत के सैनिक से ज़्यादा बहादुर, संवेदनशील,सहनशील सैनिक दुनिया में नहीं हैं " 

आप अपने राज्य हरियाणा के रेवाड़ी में भूतपूर्व सैनिकों की रैली में बोल रहे थे । राजनीति में सेना से कोई आता है तो अनुशासन और ईमानदारी की दिव्य छवि लेकर आता है । अपने तमाम सहयोगियों के महाभ्रष्टाचार का बचाव करने वाली पार्टियाँ आप लोगों को मेडल की तरह सजा कर दिखाती हैं ताकि लगे न कि राजनीति में सब चोर डाकू ही हैं । आप बोले जा रहे थे-

" आज जब देश की हालत अस्त व्यस्त है । आज जब देश एक मुश्किल दौर से गुज़र रहा है तो भूतपूर्व सैनिकों और सैनिकों आपकी बहुत ज़रूरत है क्योंकि कहीं पर कोई कमी होती है तो सेना को बुलाया जाता है । आज अगर निर्माण का काम करना है , परिवर्तन का काम करना है तो इसमें आपकी भूमिका है "

भूतपूर्व सैनिकों का आह्वान तो ठीक है मगर सैनिकों का ? परिवर्तन और निर्माण क्या है सर? सेना का आह्वान कर रहे हैं ? सैनिकों को बुला रहे हैं तो रेजीमेंटों में नेताओं के तंबू लगवा दीजिये न वोट माँगने की रैली वहाँ भी हो ही जाए । सिर्फ इसलिए कि आप ईमानदार है और सेनाध्यक्ष पद से रिटायर हुए हैं तो एक राजनैतिक मंच से सैनिकों का आह्वान कर सकते हैं । आप फिर बोल रहे है उसी रैली में -

" देश की सुरक्षा नीतियों को देखकर अफ़सोस होता है । हमारी नीतियाँ ठीक नहीं हैं । पड़ोसी देश हमारी सीमाओं का उल्लंघन करते हैं, पश्चिम, उत्तर और पूरब की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं । बेखौफ और बेखटके । इसलिए कि हमारी नीतियां ठीक नहीं हैं । इसलिए नहीं कि हम कमज़ोर हैं । क्या आप कमज़ोर हैं ? नहीं न तो जो कमज़ोर नीतियाँ बनाते हैं उन्हें बदलने की ज़रूरत है । "

मैं सर गूगल कर रहा था । जनवरी २०११ का आपका बयान है लद्दाख में चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमा के अतिक्रमण का ( सोर्स- newindianexpress.com और news.oneindia.com) । आप इस खबर का खंडन कर रहे हैं और बता रहे हैं कि यह अतिक्रमण नहीं बल्कि धारणाओं का मामला है । यानी आपके समय मे भी ऐसी बेसिर पैर की बातें होती थीं और आप खंडन करते थे । वर्ना आप कमज़ोर नीतियों के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा न दे देते । जब आप उम्र के सवाल पर सरकार को अदालत में खींच सकते हैं तो चीनी अतिक्रमण का विरोध तो कर ही सकते थे । अदालत वाली बात से पहले यह समझना चाहता हूँ कि आप बीजेपी के मंच पर क्यों होते हैं और बीजेपी के नेता आपके मंच पर क्यों ? बीजेपी आपका बचाव क्यों करने लगती है ? आपने अन्ना वाले मंच का क्या किया जिस पर आप रिटायर होते ही गए थे ।

( indiatoday.com, timesofindia.com, 02/02/2013, Day and Night news.com 20.9.2013) गूगल ने इस साइट से आपका एक बयान निकाल कर दिया है मुझे । जो अनुवाद के साथ इस प्रकार है-

" एक कमांडर के नाते मुशर्रफ का कारगिल युद्ध से पहले भारतीय सीमा में ग्यारह किमी अंदर आने के साहस की तारीफ करता हूँ । "

आप दुश्मन की करनी को साहस बताते हैं, कोई रोक सकता है आपको, आप सेनाध्यक्ष हैं न सर । खैर आगे जो कहते हैं अगर उसे नरेंद्र मोदी जी ने सुन लिया या संघ ने तो देख लिया तो हमको मत कहियेगा ।

" कारगिल के दौरान भारतीय पक्ष से ग़लतियाँ हुईं थीं जिससे पाकिस्तानी सेना को हमारी सेना में आने का मौका मिला । हमें मुशर्रफ को बच कर जाने नहीं देना चाहिए था " 

आप कारगिल युद्ध को भारतीय नीतियों( या एनडीए सरकार की ? ) की ग़लती मानते हैं तो आपने उस वक्त कमज़ोर नीतियाँ बनाने वालों को बदलने का आह्वान किया था ? नीतिसेंट्रल की साइट पर खबर छपी है कि आप रायबरेली से सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ टिकट मांग रहे हैं । ( बीजेपी ने अपने कार्यकर्ताओं को जो बुकलेट दिया है उसमें दिया है कि किन वेबसाइट का अनुसरण करना है । इनमें नीतिसेंट्रल भी एक है ) 

जनरल साहब बीजेपी में आपकी सेटिंग आडवाणी से भी बेहतर है । जिन्ना को अच्छा क्या बताया बेचारे को निपटा ही दिया गया । आप मुशर्रफ की तारीफ़ कर मोदी जी के साथ रैली करते हैं । उस मोदी जी के साथ जो गुजरात की चुनावी रैलियों में मियाँ मुशर्रफ पुकारा करते थे । संदर्भ बता दूँ या रहने दूँ सर । मोदी जी प्र म पद के उम्मीदवार बनकर पहली बार आपकी रैली में रेवाड़ी आते हैं । अभी आप बीजेपी में थोड़े न शामिल हुए हैं । तब ई हाल है । बीजेपी मरी जा रही है आपका बचाव करने में । कुछ तो बात है । जिन्ना सेकुलर और मुशर्रफ साहसिक । कहीं तब के सेनाध्यक्ष मलिक साहब पर तो टिप्पणी नहीं है ये । वाजपेयी जी की सरकार पर तो आप कर नहीं सकते न !

बीजेपी तो तब भी आपका पक्ष ले रही थी जब आप उम्र के सवाल पर सरकार से लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट चले गए । वहाँ जब सोलििटर जनरल आर एफ नरीमन ने वे सारे दस्तावेज़ दिखा दिए कि आपने कब कब दस मई १९५० का जन्मदिन मानने की बात कही है तो आपके पास बचाव में कुछ नहीं था । उससे पहले तक आप भी सूत्रों से ऐसी ख़बरें लीक कर रहे थे । आप केस हार गए और पद पर भी बने रहे । इस्तीफ़ा नहीं दिया । मैं नहीं कह रहा कि आप ईमानदार नहीं है । बल्कि सेना मे आपकी यही कमाई है । लेकिन इतिहास यह भी है कि राजनीति में कई लोगों ने इस कमाई को भुनाया भी है । 

इस बीच आपने भी आरोप लगाया कि टेट्रा ट्रक के लिए किसी लेफ्टिनेंट जनरल ने आपको १४ करोड़ की पेशकश की थी । क्या सबूत दिया आपने, नाम लिया कि नहीं और सरकारी जाँच किस स्तर पर है ये सब बाद में गूगल कर यहाँ अपडेट कर दूँगा सर । वो मेजर वाला क़िस्सा भी जो वर्दी में आपके घर दिन के वक्त जासूसी उपकरण लगाने आया था ! कुछ तो चल रहा है आपके सरकार और बीजेपी के बीच ! खंडूड़ी साहब भी सेना से आए थे । ईमानदार और बढ़िया आदमी । निशंक जैसे घोटाले के आरोपी ने उन्हें चुनावी मैदान में हरवा दिया । ख़ैर । कांग्रेस में भी सही सब होता है । 

आज इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर छपी कि आपने कोई सीक्रेट एजेंसी बनाई थी ( नहीं मालूम कि यह सेनाध्यक्ष ऐसा यूनिट बनाते हैं का) जो जम्मू कश्मीर में तख्तापलट पलट का प्रयास कर रही थी । अफ़सरों ने गवाही दी है मगर सबूत मिलने के आसार कम हैं क्योंकि रितु सरीन लिखती हैं कि सबूत मिटा दिये गए होंगे । आपने एनजीओ बनवाया । क्या क्या न किया । यह भी जानता हूँ कि सत्य तो सामने आएगा नहीं हम तो बस इधर उधर की दलीलें ही करते रह जायेंगे । 

तो बीजेपी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि सवाल समय का है । राजनीति का यक्ष प्रश्न है समय । निर्मला पूछती हैं कि रिपोर्ट मार्च में तैयार थी तो अभी क्यों लीक किया । मोदी जी के साथ दिखने के बाद । जो मोदी जी के साथ दिखेगा और राजनीति करेगा तो निर्मला जी सरकार भी तो राजनीति करेगी न । जनरल साहब राजनीति करें तो ठीक और सरकार करें तो बड़ी बेवकूफ । अरे भाई सारा सवाल टाइम को लेकर ही कीजियेगा या जो रिपोर्ट में सवाल किया गया है उस पर भी कुछ बोलियेगा । यह रिपोर्ट सरकार ने बनाई है या सेना के डीजी मिलिट्री आपरेशन ने ? निर्मला जी आपको सेना पर विश्वास नहीं है ? मोदी जी की विश्वसनीयता इतनी असंदिग्ध कब से हो गई कि आपको जनरल साहब उन्हीं के कारण फँसाया जा रहा है । आपकी वजह से क्या लेफ़्टिनेंट जनरल भाटिया पर संदेह करें कि वे सरकार के हाथ खेल रहे हैं या सेना में ईमानदारी आपके बाद समाप्त हो चुकी है । मैं तो पूछ रहा हूँ । मेरी मजबूरी है कि सरकार पर भी शत प्रतिशत भरोसा नहीं कर सकता लेकिन शक सिर्फ सरकार पर ही तो नहीं कर सकता न । निर्मला कहती हैं कि सेना का मनंोबल नहीं गिरना चाहिए । हद है । क्या रिपोर्ट बनाने वाले लेफ़्टिनेंट जनरल भाटिया सेना नहीं है क्या । क्या तब सेना का मनोबल नहीं गिरेगा जब उसके अफ़सर की जाँच रिपोर्ट पर बीजेपी इसलिए शक करे क्योंकि जिसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट है वो अब पार्टी के साथ है । निर्मला जी अगर सरकार जनरल साब को बीजेपी के कारण टारगेट कर रही है तो आप भी तो उनका बचाव इसीलिए कर रही हैं कि वे आपके साथ हैं । गंगाजल की तरह ऐसी पवित्र राजनीति हमने देखी नहीं मैम । 

इस बीच किरण बेदी जी का भी ट्विट आया है कि सरकार जनरल वी के सिंह से सोच समझ कर व्यवहार करे क्योंकि सेना के लाखों जवानों की उन पर नज़र है । वे उनकी आवाज़ भी हैं । क्या बात है जनरल साहब । बेदी जी ने यह भी कहा कि सीक्रेट सर्विस फ़ंड की कोई ज़रूरत नहीं है । जब तक शिखर का सामूहिक नेतृत्व इस पर फैसला न करे । कहीं बेदी जी आप पर शक तो नहीं कर रही हैं ? या आपको बचाने के लिए नया सुझाव दे रही हैं ! और ये क्या बेदी जी । आपके क़ानून में तो सब बराबर हैं फिर ये लाखों सैनिकों की नज़र वाली बात के क्या मायने हैं ? भड़का रही हैं ? ठीक है जनरल साहब को चिट्ठी लिख रहा हूँ मगर वे आपको भी तो फार्वर्ड कर ही सकते हैं न । 

खै़र सरकार की तरफ़ से खबर आ रही है कि वो सीबीआई जाँच के लिए नहीं कहेगी । सीक्रेट फ़ंड और सैन्य ख़ुफ़िया का मामला है पता नहीं क्या क्या सामने आ जाए । जम्मू कश्मीर के उस मंत्री ने भी खंडन कर दिया है कि आपने उसे पैसे दिये थे राज्य सरकार गिराने को । लेकिन अन्ना जी जो एक सिपाही थे वे अपनी सेना के जनरल से नाराज़ हो गए हैं । उन्होंने कहा है कि अगर जनरल साहब मोदी के साथ गए तो देश का यह सच्चा सिपाही उनसे रिश्ता तोड़ लेगा ( बात सही है थोड़ी नमक मिर्च लगा दी है मैंने जैसे सच्चा सिपाही वाली बात ) 

अंत भला तो सब भला । आप राजनीति कर रहे हैं । ईश्वर करें आप सफल हों और वो दृश्य भी देख सकूँ कि आपके आह्वान पर सैनिक नीतियाँ बनाने वालों को बदलने निकल पड़ें ! ठीक सर ।

आपका ग़ैर सैनिक देशभक्त

रवीश कुमार' एंकर' 

(Ashok Kumar Pandey shared a link.)

Saturday, 21 September 2013

अनंतमूर्ति का बयान और उसके विरोधों के निहितार्थ - Ashok Kumar Pandey

"सौ बार इस फरार से बेहतर है खुदकशी, 
क्या गुलिस्ताँ को छोड़ दें बिजली के डर से हम !"
हम लड़ेंगे, साथी!
उनके नापाक मंसूबे ध्वस्त होने तक 
या अपनी ज़िन्दगी की आख़िरी साँस तक हम लड़ेंगे...
न तो अनन्तमूर्ति कहीं जायेंगे और 
न ही हम सभी मैदान-ए-जंग से भागने जा रहे हैं....
यह मुल्क हमारा है, हम सब का है....
इसे हम उनको अपनी चारागाह नहीं बनाने देंगे...
जीतता वही है, जो लड़ता है...

Ashok Kumar Pandey - साहित्यकार अनन्तमूर्ति का वह बयान यह है, जिस पर टिप्पणियाँ की जा रही हैं.
(इस सवाल और जवाब को देखिये और फिर बताइये कि वह जो कह रहे हैं उसके मानी वही हैं जिसके आधार पर आप उन्हें गालियाँ दे रहे हैं? जवाब का अनुवाद मैंने हिंदी में भी कर दिया है)

सवाल : What has been the reaction to your comment? How would you reply to it?

अनंतमूर्ति : I grew up critical of Nehru and Indira. I was against the Emergency. I was criticised for that but never abused like I have been now. This is the nature of fascism. The man has the might of the corporate world behind him, and most of the media. And all these admirers get worried about one remark made by literary man. After all, that’s what I am, a writer. I don’t even write in English. It shows that literature still has power. When an authoritarian personality comes to power, those who are silent now, will be even more silent. So, I don’t want to live in a world where Modi is Prime Minister.

"मैं नेहरू और इंदिरा के प्रति आलोचनात्मक हो गया. मैं आपातकाल के खिलाफ़ था. इसके लिए मेरी आलोचना हुई मुझे ऐसे गालियाँ कभी नहीं दी गयीं जैसी आज दी जा रही हैं. इस आदमी के पीछे कारपोरेट जगत की ताकत है और अधिकाँश मीडिया की भी. और इसके सभी प्रसंशक एक साहित्यिक आदमी की टिप्पणी से परेशान हो गए. आखिरकार मैं वही हूँ, एक लेखक. . यहाँ तक कि मैं अंग्रेजी में भी नहीं लिखता. यह दिखाता है कि साहित्य में अब भी ताक़त है. जब एक सर्वसत्तावादी सत्ता में आता है तो जो आज चुप हैं वे और चुप हो जायेंगे. इसलिए मैं एक ऐसी दुनिया में नहीं रहना चाहता जहाँ मोदी प्रधानमंत्री हो."

 तो देश भी सिर्फ भौगोलिक सीमा नहीं होता, वह मानसिक और वैचारिक निर्मिति भी होता है. इस भारत कहे जाने वाले भौगोलिक देश में एक मोदी की दुनिया रहती है जहाँ विरोध के लिए कोई जगह नहीं, जहाँ सहिष्णुता कोई जीवन मूल्य नहीं, जहाँ संविधान की कोई क़ीमत नहीं, जहाँ लेखक का पर्यायवाची चारण है. चाहें तो दो साल पहले हुए गुजरात साहित्य अकादमी के उर्दू कवि के साथ व्यवहार को याद कर लें. चाहें तो सरूप ध्रुव जैसी गुजराती लेखिका से पूछ लें. जो होशियार हैं वे चुप हैं, आहिस्ता आहिस्ता जबानें बदल रहे हैं जो नहीं हैं वे अनंतमूर्ति की तरह साफ़ बोल रहे हैं और गालियाँ सुन रहे हैं. उनकी दिक्कत यह है कि वह अपनी वैचारिक नागरिकता के प्रति प्रतिबद्ध हैं, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी भौगोलिक नागरिकता त्यागनी पड़े.
लेकिन लोग इसे समझना नहीं चाहते. वे अस्सी साल के लेखक से, जो आज भी सड़क पर खड़ा है अपने एक साथी की किताब पर प्रतिबंध लगाए जाने के ख़िलाफ़, ‘वीरता’ के उच्चतम मानदंडों की उम्मीद करते हैं लेकिन ख़ुद उसकी चिंताओं पर सोचने को भी तैयार नहीं. वे उन हालात को रोकने के लिए लड़ाई में उतरने को तैयार नहीं. उनके पास अनंतमूर्ति को देने के लिए यह आश्वासन नहीं कि आपको कहीं नहीं जाना पड़ेगा, हम हिटलर के इस अवतार को सत्ता में आने ही नहीं देंगे. वे उनके ‘पलायन’ को प्रश्नांकित करते हैं और इस तरह उनके संघर्षों और उनकी चिंताओं को परदे के पीछे भेज दिए जाने में मदद करते हैं. मुझे डर है कि वे अपनी भौगोलिक नागरिकता बचाने के लिए अपनी वैचारिक नागरिकता त्यागने की तैयारियाँ मुकम्मिल करने में लगे हैं. अगर नहीं तो उन्हें समझना चाहिए कि यह एक लेखक की कातर पुकार नहीं चुनौती है अपने नागरिकों के प्रति.

"फासीवाद की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि वह अफवाह फैलाता है. जैसा कि संघ परिवार ने मेरे साथ किया. एक कन्नड़ अखबार है 'कन्नड़ प्रबाह' जिसने मेरे बारे में अफवाहें और गन्दी चीजें प्रकाशित कीं. ऐसी चीजें कि मुझे मर जाना चाहिए. यही हिटलर के समय में हुआ था. मेरा शोध इसी पर है." - अनंतमूर्ति, एक साक्षात्कार में 


वरिष्ठ कन्नड़ लेखक अनंतमूर्ति के बयान के बाद सोशल मीडिया सहित तमाम जगहों पर बवाल मचा है . ज़ाहिर है कि मोदी को लकड़ी के लाल किले से असली वाले लाल किले तक पहुँचाने की कोशिश में लगे संघ गिरोह और उसके समर्थकों को यह बुरा लगता. ज़ाहिर है कि वे उन्हें देश से चले जाने की सलाहें देने भर से संतुष्ट नहीं होते और उनकी ह्त्या तक की बात करते, लेकिन जो लोग मोदी के समर्थक नहीं हैं वे भी इस बयान से खासे नाराज़ ही नहीं नज़र आ रहे बल्कि उन्हें भगोड़ा और कायर भी कह रहे हैं. रवीश कुमार जैसे समझदार और उदार समझे जाने वाले पत्रकार भी इस मुद्दे पर जिस तरह ‘जनमत’ के नाम पर उनके प्रति अपमानजनक टिप्पणियाँ कर रहे हैं वह सच में हैरान करने वाला है. यहाँ यह भी समझने की ज़रुरत है कि उनकी प्रयुक्त शब्दावली थी, 'आई डीड ना वांट टू लिव इन अ कंट्री रुल्ड बाई मोदी'. लिव रहना ही नहीं होता, जीना भी होता है. उन्होंने कहीं विदेश जाने की बात नहीं की हैं. वह कह रहे हैं कि ऐसे देश में वह जीना नहीं चाहेंगे जिसका प्रधानमंत्री मोदी हो. वह कह रहे हैं कि वह इस धक्के से मर जाएँगे. (मूल बयान यहाँ पढ़ा जा सकता है)

फिर भी चलिए मान लेते हैं कि वह विदेश जाने की ही बात कर रहे हैं. तो भी एक अस्सी साल के लेखक के प्रति जिस तरह की असहिष्णुता दिखाई जा रही है, वह यह तो बिलकुल साफ़ करती है कि कम से कम भारत में लेखकों को लेकर न्यूनतम सम्मान वाली स्थिति भी नहीं है, वरना शायद इस शोरगुल का एक हिस्सा अनंतमूर्ति की उस चिंता के लिए भी होता जो उस वक्तव्य में उन्होंने एक फासिस्ट सरकार आने की दशा में भारत के सेकुलर और सहिष्णु ताने बाने को लेकर जताई है. एक ऐसे देश में जहाँ मध्यवर्ग का सबसे बड़ा सपना अपने बच्चों या मुमकिन हो तो खुद अपने लिए अमेरिका या किसी अन्य पश्चिमी देश में एक अदद नौकरी हासिल कर लेना हो, मोदी जिस प्रदेश से आते हैं वहां तो अमेरिका और कनाडा जाने के लिए क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी तरीक़े अपनाना एकदम रोजमर्रा की बात है, एक ऐसे देश में जहाँ ‘इम्पोर्टेड’ अब भी एक पवित्र शब्द हो वहां एक लेखक के इस बयान पर इतना शोर! 


न जाने क्यों मुझे ऐसे में गुजरात के उस मुसलमान युवक की याद आ रही है जिसका दंगाइयों के सामने हाथ जोड़े फ़ोटो उस दौर में गुजरात दंगों की त्रासदी का प्रतीक बन गया था. वह गुजरात से कोलकाता चला गया था! एक प्रोफ़ेसर बंदूकवाला थे जो एक नयी और आधुनिक रिहाइश में अपने हिन्दू दोस्तों के बीच रहने चले आये थे उन दंगों के पहले और फिर उन्हें वहाँ दंगों के दौरान इतना परेशान किया गया कि वह लौटकर पुरानी मुस्लिम बस्ती में चले गए. विभाजन के समय यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ आये लोगों का क़िस्सा तो पुराना हुआ अभी मुजफ्फरपुर दंगों के बाद कितने लोग अपना गाँव छोड़कर किसी और सुरक्षित ठिकाने पर चले गए! देश न छोड़ सके तो देस छुडा दिया गया. हिटलर के राज में , जिससे अनंतमूर्ति सहित तमाम लोग नरेंद्र मोदी की तुलना करते हैं, ब्रेख्त सहित कितने लोगों को देश छोड़ना पड़ा और सी आई ए ने किस तरह चार्ली चैपलिन को देश छोड़ने पर मज़बूर किया ये किस्से इतने भी पुराने नहीं (चाहें तो इसमें सोवियत संघ से देश छोड़ने वाले, कश्मीर से देश छोड़ने वाले, पाकिस्तान और इरान से देश छोड़ने वाले, फलस्तीन से देश छोड़ने वाले तमाम जाने अनजाने लोगों को जोड़ लें, मैं बख्श किसी को नहीं रहा, सिर्फ उदाहरणों की भीड़ लगाने की जगह प्रतिनिधि उदाहरण प्रस्तुत कर दे रहा हूँ). क्या कहेंगे आप इन सब लोगों को? भगोड़ा? कायर? देशद्रोही? कह लीजिये कि अभी आप ऐसे हालात से नहीं गुज़रे.

अनंतमूर्ति . कर्नाटक में रहकर कन्नड़ में लिखते हैं. उस कर्नाटक में जहाँ दक्षिणी राज्यों में पहली बार बी जे पी सत्ता में आई और श्रीराम सेने के उत्पातों के रूप में शिवसेना और बजरंग दल के उत्पातों का प्रयोग हुआ. जहाँ उनका मशहूर उपन्यास ‘संस्कारम’ लगातार विवाद में रहा. जो उन्हें जानते हैं वह शायद यह भी जानते होंगे कि एक लेखक की तरह सिर्फ लिखकर ही नहीं एक कार्यकर्ता की तरह सड़क पर आकर भी उन्होंने साम्प्रदायिक शक्तियों की मुखालिफत की. इमरजेंसी के खिलाफ स्टैंड लिया. चौरासी के दंगों पर तीखी प्रतिक्रिया दी और एक लोकसभा चुनाव इस घोषणा के साथ लड़ा कि वह ‘ भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ लड़ने के मुख्य वैचारिक उद्देश्य से ही चुनाव लड़ रहे हैं’. यही नहीं उन्होंने चुनाव में देवेगौडा का दिया टिकट तब ठुकरा दिया जब देवेगौड़ा ने बीजेपी के साथ समझौता कर लिया. वह वामपंथी भी नहीं हैं. लोग जानते ही हैं कि बेंगलोर को बेंगलुरु नाम देने के आन्दोलन में वह बेहद सक्रीय रहे हैं. असल में वह एक ओर ब्राह्मणवादी संस्कारों और विचारों के कट्टर विरोधी रहे हैं तो साथ में देशज आधुनिकता के समर्थक हैं. इस रूप में वह शब्दवीर भर नहीं कि उन्हें शोशेबाज़ी का शौक हो. वह सक्रिय राजनैतिक लेखक रहे हैं जिन्होंने ऐसी ताक़तों के खिलाफ लगातार लड़ाई लड़ी है. वह राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, शान्तावेरी गोपाल गौड़ा जैसे समाजवादी नेताओं के साथ नजदीकी से जुड़े रहे हैं. ऐसे में अगर वह मोदी के आने के बाद देश छोड़ने की बात कह रहे हैं तो उसे समझा जाना चाहिए. एक सक्रिय वयोवृद्ध लेखक यह कह भर नहीं रहे हैं, यह कहते हुए कर्नाटक में ‘धुंडी’ पर लगे प्रतिबंध और उसके लेखक योगेश मास्टर की गिरफ्तारी के खिलाफ सक्रिय हैं. तो यह पलायन नहीं है. इस उम्र में वह अपने शरीर और अपने हौसलों की सीमा जानते हैं. वह जानते हैं कि देश में साम्प्रदायिक शक्तियों के हाथ में ताक़त आने के बाद उन जैसे लेखकों के विरोध का अधिकार किस तरह छीना जाने वाला है. 

इस इंटरव्यू के बाद उठे विवाद की रौशनी में दिए गए एक इंटरव्यू में वह कहते हैं, ‘मैं नेहरू और इंदिरा के प्रति आलोचनात्मक हो गया. मैं आपातकाल के खिलाफ़ था. इसके लिए मेरी आलोचना हुई मुझे ऐसे गालियाँ कभी नहीं दी गयीं जैसी आज दी जा रही हैं. इस आदमी के पीछे कारपोरेट जगत की ताकत है और अधिकाँश मीडिया की भी. और इसके सभी प्रसंशक एक साहित्यिक आदमी की टिप्पणी से परेशान हो गए. आखिरकार मैं वही हूँ, एक लेखक. . यहाँ तक कि मैं अंग्रेजी में भी नहीं लिखता. यह दिखाता है कि साहित्य में अब भी ताक़त है. जब एक सर्वसत्तावादी सत्ता में आता है तो जो आज चुप हैं वे और चुप हो जायेंगे. इसलिए मैं एक ऐसी दुनिया में नहीं रहना चाहता जहाँ मोदी प्रधानमंत्री हो.’ गौर कीजिए वह यहाँ ‘देश’ नहीं ‘दुनिया’ कह रहे हैं. साहित्य की भाषा से परिचित लोग जानते हैं कि दुनिया का मतलब वह दुनिया ही नहीं होता जिसका राजा आज अमेरिका है. दुनिया भावभूमि के रूप में प्रयुक्त होती है, जैसे लेखकों की दुनिया, कवियों की दुनिया, कलाकारों की दुनिया. तो देश भी सिर्फ भौगोलिक सीमा नहीं होता, वह मानसिक और वैचारिक निर्मिति भी होता है. इस भारत कहे जाने वाले भौगोलिक देश में एक मोदी की दुनिया रहती है जहाँ विरोध के लिए कोई जगह नहीं, जहाँ सहिष्णुता कोई जीवन मूल्य नहीं, जहाँ संविधान की कोई क़ीमत नहीं, जहाँ लेखक का पर्यायवाची चारण है. चाहें तो दो साल पहले हुए गुजरात साहित्य अकादमी के उर्दू कवि के साथ व्यवहार को याद कर लें. चाहें तो सरूप ध्रुव जैसी गुजराती लेखिका से पूछ लें. जो होशियार हैं वे चुप हैं, आहिस्ता आहिस्ता जबानें बदल रहे हैं जो नहीं हैं वे अनंतमूर्ति की तरह साफ़ बोल रहे हैं और गालियाँ सुन रहे हैं. उनकी दिक्कत यह है कि वह अपनी वैचारिक नागरिकता के प्रति प्रतिबद्ध हैं, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी भौगोलिक नागरिकता त्यागनी पड़े.

लेकिन लोग इसे समझना नहीं चाहते. वे अस्सी साल के लेखक से, जो आज भी सड़क पर खड़ा है अपने एक साथी की किताब पर प्रतिबंध लगाए जाने के ख़िलाफ़, ‘वीरता’ के उच्चतम मानदंडों की उम्मीद करते हैं लेकिन ख़ुद उसकी चिंताओं पर सोचने को भी तैयार नहीं. वे उन हालात को रोकने के लिए लड़ाई में उतरने को तैयार नहीं. उनके पास अनंतमूर्ति को देने के लिए यह आश्वासन नहीं कि आपको कहीं नहीं जाना पड़ेगा, हम हिटलर के इस अवतार को सत्ता में आने ही नहीं देंगे. वे उनके ‘पलायन’ को प्रश्नांकित करते हैं और इस तरह उनके संघर्षों और उनकी चिंताओं को परदे के पीछे भेज दिए जाने में मदद करते हैं. मुझे डर है कि वे अपनी भौगोलिक नागरिकता बचाने के लिए अपनी वैचारिक नागरिकता त्यागने की तैयारियाँ मुकम्मिल करने में लगे हैं. अगर नहीं तो उन्हें समझना चाहिए कि यह एक लेखक की कातर पुकार नहीं चुनौती है अपने नागरिकों के प्रति.



I won't live in a country ruled by Narendra Modi: UR Ananthamurthy 
D P Satish, IBNLive.com | Posted on Sep 18, 2013 
Internationally acclaimed Kannada writer and thinker Dr UR Ananthamurthy said that he did not want to live in a country ruled by Gujarat Chief Minister Narendra Modi. The 81 year old, ailing writer feels that a man like him, who always fought against authoritarian tendencies in the government cannot live in India, if Modi comes to power in the next Lok Sabha elections. The Jnanapeeth Award recipient for the year 1994, Ananthamurthy has been a part of the socialist movement in Karnataka. Ananthamurthy was a close associate of stalwarts like Ram Manohar Lohia, Jayaprakash Narayan, Shanthaveri Gopala Gowda and many other top socialist leaders. He has been a vocal critic of the RSS and BJP/Jan Sangh for over 50 years. Murthy who spoke to Ibnlive.com from his hospital bed in Bangalore said, "I won't live in a country ruled by Narendra Modi. When I was young, I used to criticise Prime Minister Nehru. But, his supporters never attacked us. They always respected our views. Modi supporters are now behaving like Fascists. They are behaving like the Fascists in Germany during Hitler. I don't want to see a man like Modi in the chair, where once a man like Nehru sat and ruled. I am too old and unwell. If Modi becomes the PM, it will be a big shock to me. I won't live." Ananthamurthy said he don't want to see a man like Modi in the chair, where once a man like Nehru sat and ruled. Ananthamurthy said he don't want to see a man like Modi in the chair, where once a man like Nehru sat and ruled. Murthy had attacked LK Advani during his Rath Yathra and after the demolition of Babri Masjid. However he had backed B S Yeddyurappa for the post of the Chief Minister on the grounds that he was cheated by the Gowdas and he is from a farming background. Ananthamurthy has also been a part of all progressive movements that took shape in the last 50 years. He had served as President Kendra Sahitya Academy, National Book Trust, FTII Pune and Vice Chancellor of the Mahatma Gandhi University, Kottayam. He is currently the Chancellor of Central University in Gulbarga. He was one of the finalists of the Man Booker life time achievement award, earlier this year. Murthy taught English literature at Mysore University for over three decades. He did PHD in literature from the University of Birmingham, United Kingdom in the early 1960s. His first novel 'Sanskara' had created a huge controversy in the 1960s. In this novel, he questions the rigid caste system practiced by the Brahmins.

Read more at: http://ibnlive.in.com/news/i-wont-live-in-a-country-ruled-by-narendra-modi-ur-ananthamurthy/423015-62-129.html?utm_source=ref_article

Tuesday, 17 September 2013

हम सब दाभोलकर ! - सुभाष गाताडे


अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्षरत एक संग्रामी की शहादत
‘‘जिन्दगी जीने के दो ही तरीके मुमकिन हैं। पहला यही कि कोई भी चमत्कार नहीं। दूसरा, सबकुछ चमत्कार ही है।’’ - अलबर्ट आइनस्टाइन

लब्जों की यह खासियत समझी जाती है कि वे पूरी चिकित्सकीय निर्लिप्तता के साथ ग्राही/ग्रहणकर्ता के पास पहुंचते हैं। यह ग्राही पर निर्भर करता है कि वह उनके मायने ढंूढने की कोशिश करे। बीस अगस्त की अलसुबह पुणे की सड़क पर अंधश्रद्धा विरोधी आन्दोलन के अग्रणी कार्यकर्ता डा नरेन्द्र दाभोलकर की हुई सुनियोजित हत्या की ख़बर से उपजे दुख एवं सदमे से उबरना उन तमाम लोगों के लिए अभीभी मुश्किल जान पड़ रहा है, जो अपने अपने स्तर पर प्रगति एवं न्याय के संघर्ष में मुब्तिला हैं।

पुणे के निवासियों के एक बड़े हिस्से के लिए मुला मुठा नदी के किनारे बना ओंकारेश्वर मंदिर वह जगह हुआ करती रही है जहां लोग अपने अन्तिम संस्कार के लिए ले लाए जाते रहे हैं। इसे विचित्रा संयोग कहा जाएगा कि उसी मन्दिर के ऊपर बने पूल से अल सुबह गुजरते हुए डा नरेन्द्र दाभोलकर ने अपनी झंझावाती जिन्दगी की चन्द आखरी सांसें लीं। एक जुम्बिश ठहर गयी, एक जुस्तजू अधबीच थम गयी। मोटरसाइकिल पर सवार हत्यारे नौजवानों द्वारा दागी गयी चार गोलियों में से दो उनके सिर के पिछले हिस्से में लगी थी और वह वहीं खून से लथपथ गिर गए थे।

अपनी मृत्यु के एक दिन पहले शाम के वक्त मराठी भाषा के सहयाद्री टीवी चैनल पर उपस्थित होकर वह जातिपंचायतों की भूमिका पर अपनी राय प्रगट कर रहे थे। उस वक्त किसे यह गुमान हो सकता था कि उन्हें ‘सजीव’ अर्थात लाइव सुनने का यह आखरी अवसर होनेवाला है। यह पैनल चर्चा नासिक जिले की एक विचलित करनेवाली घटना की पृष्ठभूमि में आयोजित की गयी थी, जहां किसी कुम्हारकर नामक व्यक्ति द्वारा अपनी जाति पंचायत के आदेश पर अपनी बेटी का गला घोंटने की घटना सामने आयी थी। वजह थी उसका अपनी जाति से बाहर जाकर किसी युवक से प्रेमविवाह। चर्चा में हिस्सेदारी करते हुए डा दाभोलकर बता रहे थे कि किस तरह उन्होंने हाल के दिनों में अन्तरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए सम्मेलन का आयोजन किया था और इसी मसले पर घोषणापत्र भी तैयार किया था।

एक बहुआयामी व्यक्ति - प्रशिक्षण से डाक्टरी चिकित्सक, अपनी रूचि के हिसाब से देखें तो लेखक-सम्पादक एवं वक्ता और एक आवश्यकता की वजह से एक आन्दोलनकारी, यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पूरे मुल्क के तर्कशील आन्दोलन के लिए वह एक अद्भुत मिसाल थे और अपने संगठन एवं उसकी 200 से अधिक शाखाओं के जरिए सूबा महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं गोवा में जनजागृति के काम में लगे थे। बहुत कम लोग जानते थे कि अपने स्कूल-कालेज के दिनों में वह जानेमाने कब्बडी के खिलाड़ी थे, जिन्होंने भारतीय टीम के लिए मेडल भी जीते थे। हालांकि उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरूआत डाक्टरी प्रैक्टिस से की थी, मगर जल्द ही वह डा बाबा आढाव द्वारा संचालित ‘एक गांव, एक जलाशय (पाणवठा)’ नामक मुहिम से जुड़ गए थे। विगत दो दशक से अधिक समय से वह अंधश्रद्धा के खिलाफ मुहिम में मुब्तिला थे।

डा दाभोलकर की प्रचण्ड लोकप्रियता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके मौत की ख़बर सुनते ही महाराष्ट्र के तमाम हिस्सों में स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन हुए, और उनके गृहनगर सातारा में तो जुलूस में शामिल हजारों की तादाद ने जिन्दगी के सत्तरवें बसन्त की तरफ बढ़ रहे अपने नगर के इस प्रिय एवं सम्मानित व्यक्ति को अपनी आदरांजलि दे दी। 21 अगस्त को पुणे शहर में सभी पार्टियों के संयुक्त आवाहन पर बन्द का आयोजन किया गया।

राजनेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सभी ने डाॅक्टर दाभोलकर को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। उन्हें किस हद तक विरोध का सामना करना पड़ता था इस बात का अन्दाज़ा इस तरह लगाया जा सकता है कि विगत अठारह साल से महाराष्ट्र विधानसभा के सामने एक बिल लम्बित पड़ा रहा है जिसका फोकस जादूटोना करनेवाले या काला जादू करनेवाली ताकतों पर रोक लगाना है। रूढिवादी हिस्से के विरोध को देखते हुए इस बिल में आस्था क्या है या अंधआस्था किसे कहेंगे इसको परिभाषित करने से बचा गया था और सूबे में व्यापक पैमाने पर व्यवहार में रहनेवाली अंधश्रद्धाओं को निशाने पर रखा गया था। ऐसी गतिविधियां संज्ञेय एवं गैरजमानती अपराध के तौर पर दर्ज हों, ऐसे अपराधों की जांच के लिए या उन पर निगरानी रखने के लिए जांच अधिकारी नियुक्त करने की बात भी इसमें की गयी थी।

‘महाराष्ट्र प्रीवेन्शन एण्ड इरेडिकेशन आफ हयूमन सैक्रिफाइस एण्ड अदर इनहयूमन इविल प्रैक्टिसेस एण्ड ब्लैक मैजिक’ शीर्षक इस बिल का हिन्दु अतिवादी संगठनों ने लगातार विरोध किया है, पिछले दो साल से वारकरी समुदाय के लोगों ने भी विरोध के सुर में सुर मिलाया है। और इन्हीं का हवाला देते हुए इस अन्तराल में सूबे में सत्तासीन सरकारों ने इस बिल को पारित नहीं होने दिया है। आप इसे डा दाभोलकर की हत्या से उपजे जनाक्रोश का नतीजा कह सकते हैं या सरकार द्वारा अपनी झेंप मिटाने के लिए की गयी कार्रवाई कह सकते हैं कि कि इस दुखद घटना के महज एक दिन बाद महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट में इस बिल को लेकर एक अध्यादेश लाने का निर्णय लिया गया है।

निःस्सन्देह उनकी हत्या के पीछे एक सुनियोजित साजिश की बू आती है। आखिर किसने ऐसे शख्स की हत्या की होगी जिसने महाराष्ट्र की समाजसुधारकों की - ज्योतिबा फुले, महादेव गोविन्द रानडे या गोपाल हरि आगरकर - विस्मृत हो चली परम्परा को नवजीवन देने की कोशिश की थी ?

कई सारी सम्भावनाएं हैं। यह सही है कि उनके कोई निजी दुश्मन नहीं थे मगर अंधश्रद्धा के खिलाफ उनके अनवरत संघर्ष ने ऐसे तमाम लोगों को उनके खिलाफ खड़ा किया था, जिनको उन्होंने बेपर्द किया था। तयशुदा बात है कि ऐसे लोग कारस्तानियों में लगे होंगे। राजनीति में सक्रिय यथास्थितिवादी शक्तियों के लिए भी उनके काम से परेशानी थी। पुलिस ने कहा कि वह इन आरोपों की भी पड़ताल करेगी कि इसके पीछे सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति जैसी अतिवादी संस्थाओं का हाथ तो नहीं है, जिसके सदस्य महाराष्ट्र एवं गोवा में आतंकी घटनाओं में शामिल पाए गए हैं। इस बात को रेखांकित करना ही होगा कि कई भाषाओं में प्रकाशित अपने अख़बार ‘सनातन प्रभात’ के जरिए इन संस्थाओं ने डा दाभोलकर के खिलाफ जबरदस्त मुहिम चला रखी थी, इतनाही नहीं उन्होंने दाभोलकर के ऐसे फोटो भी प्रकाशित किए थे, जिसे लाल रंग से क्रास किया गया था, जिसमें उनकी सांकेतिक समाप्ति की तरफ इशारा था।

डा दाभोलकर को दी अपनी श्रद्धांजलि में लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक आनन्द तेलतुम्बडे लिखते हैं कि 

‘..दाभोलकर की हत्या के बाद भी सनातन संस्था ने उनके प्रति अपनी घृणा के भाव को छिपाया नहीं बल्कि अगले ही दिन जबकि पूरा राज्य दुख एवं सदमे में था, उन्होंने अपने मुखपत्रा में लिखा कि यह ईश्वर की कृपा थी कि दाभोलकर की मृत्यु ऐसे हुई। गीता को उदधृत करते हुए लिखा गया कि जो जनमा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, जन्म एवं मृत्यु हरेक की नियति के हिसाब से होते हैं। हरेक को अपने कर्म का फल मिलता है। बिस्तर पर पड़े पड़े बीमारी से मरने के बजाय, डा दाभोलकर की जो मृत्यु हुई वह ईश्वर की ही कृपा थी।’..इतनाही नहीं इस हत्या से अपने सम्बन्ध से इन्कार करने के लिए बुलायी गयी प्रेस कान्फेरेन्स में उन्हें यह कहने में भी संकोच नहीं हुआ कि वह दाभोलकर की लाल रंग से क्राॅस की गयी तस्वीर की तरह कई अन्यों की तस्वीरें भी प्रकाशित करेंगे। कहने का तात्पर्य कि जो दाभोलकर की राह चलेगा उन्हें वह नष्ट करेंगे।’

ऐसा नहीं था कि डा दाभोलकर को इस बात का अन्दाजा नहीं था कि ऐसी ताकतें किस हद तक जा सकती हैं। उनके परिवार के सदस्यों के मुताबिक उन्हें अक्सर धमकियां मिलती थीं, लेकिन उन्होंने पुलिस सुरक्षा लेने से हमेशा इन्कार किया। उनके बेटे हामिद ने कहा कि ‘‘वे कहते थे कि उनका संघर्ष अज्ञान की समाप्ति के लिए है और उससे लड़ने के लिए उन्हें हथियारों की जरूरत नहीं है।’’ उनके भाई ने अश्रुपूरित नयनों से बताया कि जब हम लोग उनसे पुलिस सुरक्षा लेने का आग्रह करते थे, तो वह कहते थे कि ‘अगर मैंने सुरक्षा ली तो वे लोग मेरे साथियों पर हमला करेंगे। और यह मैं कभी बरदाश्त नहंीं कर सकता। जो होना है मेरे साथ हो।’’

विभिन्न बाबाओं के खिलाफ एवं साध्वियों के खिलाफ भी उन्होंने ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के बैनरतले आन्दोलन चलाया था। एक किशोरी के साथ कथित बलात्कार के आरोपों के चलते इन दिनों सूर्खियां बटोर रहे आसाराम बापू ने पिछले दिनों होली के मौके पर नागपुर में अपने शिष्यों के साथ होली के कार्यक्रम का आयोजन किया था। काफी समय से सूखा झेल रहे महाराष्ट्र में इस कार्यक्रम के लिए लाखों लीटर पीने के पानी के टैंकरों का इन्तजाम किया गया था। समिति के बैनरतले डा दाभोलकर ने इस कार्यक्रम को चुनौती दी और अन्ततः यह कार्यक्रम नहीं हो सका। चर्चित निर्मल बाबा के खिलाफ भी डा दाभोलकर ने पिछले दिनों अपना मोर्चा खोला था। यू टयूब पर आप चाहें तो डा दाभोलकर के भाषण को सुन सकते हैं निर्मल बाबा: शोध आणि बोध। यह वही निर्मल बाबा हैं जिनका कार्यक्रम एक साथ 40 विभिन्न चैनलों पर चलता है जहां लोगों को उनकी समस्याओं के समाधान के नाम पर ईश्वरीय कृपा की सौगात दी जाती है। उनकी समागम बैठकों में 2000 रूपए के टिकट भी लगते हैं।

वर्ष 2008 में डा दाभोलकर एवं अभिनेता एवं समाजकर्मी डा श्रीराम लागू ने ज्योतिषियों के लिए एक प्रश्नमालिका तैयार की और कहा कि अगर उन्होंने तर्कशीलता की परीक्षा पास की तो उन्हें पुरस्कार मिल सकता है। अभी तक इस पर दांवा ठोकने के लिए कोई आगे नहीं आया। वर्ष 2000 में अपने संगठन की पहल पर उन्होंने राज्य के सैकड़ो महिलाओं की रैली अहमदनगर जिले के शनि शिंगणापुर मन्दिर तक निकाली जिसमें महिलाओं के लिए प्रवेश वर्जित था। न केवल रूढिवादी तत्वों ने बल्कि शिवसेना एवं भाजपा के कार्यकर्ताओं ने परम्परा एवं आस्था की दुहाई देते हुए महिलाओं के प्रवेश को रोकना चाहा, उनकी गिरफ्तारियां भी हुईं और फिर मामला मुंबई की उच्च अदालत पहुंचा और सुनने में आया है कि मामला पूरा होने के करीब है।

अपने एक आलेख ‘ रैशनेलिटी मिशन फार सक्सेस इन लाइफ’ में जिसमें ‘उनका मकसद आवश्यक बदलाव के लिए लोगों को प्रेरित करना है’ उन्होंने लिखा था:

'परम्पराओं, रस्मोरिवाज और मन को विस्मित कर देनेवाली प्रक्रियाओं से बनी युगों पुरानी अंधश्रद्धाओं की पूर्ति के लिए पैसा, श्रम और व्यक्ति एवं समाज का समय भी लगता है। आधुनिक समाज ऐसे मूल्यवान संसाधनों को बरबाद नहीं कर सकता। दरअसल अंधश्रद्धाएं इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि गरीब एवं वंचित लोग अपने हालात में यथावत बने रहें और उन्हें अपने विपन्न करनेवाले हालात से बाहर आने का मौका तक न मिले। आइए हम प्रतिज्ञा लें कि हम ऐसी किसी अंधश्रद्धा को स्थान नहीं देगें और अपने बहुमूल्य संसाधनों को बरबाद नहीं करेंगे। उत्सवों पर करदाताओं का पैसा बरबाद करनेवाली, कुम्भमेला से लेकर मंदिरों/मस्जिदों/गिरजाघरों के रखरखाव के लिए पैसा व्यय करनेवाली सरकारों का हम विरोध करेंगे और यह मांग करेंगे कि पानी, उर्जा, कम्युनिकेशन, यातायात, स्वास्थ्यसेवा, प्रायमरी शिक्षा और अन्य कल्याणकारी एवं विकाससम्बन्धी गतिविधियों के लिए वह इस फण्ड का आवण्टन करें।'

उनके जीवन की एक अन्य कम उल्लेखित उपलब्धि रही है, विगत अठारह साल से उन्होंने किया ‘साधना’ नामक साप्ताहिक का सम्पादन, जिसने अपनी स्थापना के 65 साल हाल ही में पूरे किए। जानकार बताते हैं कि जब उन्होंने सम्पादक का जिम्म सम्भाला तो सानेगुरूजी जैसे स्वतंत्राता सेनानी एवं समाजसुधारक द्वारा स्थापित यह पत्रिका काफी कठिन दौर से गुजर रही थी, मगर उनके सम्पादन ने इस परिदृश्य को बदल दिया और आज भी यह पत्रिका तमाम परिवर्तनकामी ताकतों के विचारों के लिए मंच प्रदान करती है।

ठीक ही कहा गया है कि डा दाभोलकर की असामयिक मौत देश के तर्कवादी आन्दोलन के लिए गहरा झटका है। देश में दक्षिणपंथी ताकतों के उभार के चलते पहले से ही तमाम चुनौतियों का सामना कर रहे इस आन्दोलन ने अपने एक सेनानी को खोया है। मगर अतिवादी ताकतों के हाथ उनकी मौत दरअसल उन सभी के लिए एक झटका कही जा सकती है जो देश में एक प्रगतिशील बदलाव लाने की उम्मीद रखते हैं। अब यह देखना होगा कि उनकी मृत्यु से उपजे प्रचण्ड दुख एवं गुस्से को ऐसी तमाम ताकतें मिल कर किस तरह एक नयी संकल्पशक्ति में तब्दील कर पाती हैं ताकि अज्ञान, अतार्किकता एवं प्रतिक्रिया की जिन ताकतों के खिलाफ लड़ने में डा दाभोलकर ने मृत्यु का वरण किया, वह मशाल आगे भी जलती रहे।

प्रतिक्रियावादी तत्व भले ही डा दाभोलकर को मारने में सफल हुए हों, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह से उनकी हत्या हुई है उसने तमाम नए लोगों को भी दिमागी गुलामी के खिलाफ जारी इस व्यापक मुहिम से जोड़ा भी है। यह अकारण नहीं कि महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर हुई रैलियों में तमाम बैनरों, पोस्टरों में एक छोटे-से पोस्टर ने तमाम लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था जिस पर लिखा था ‘आम्ही सगले दाभोलकर’ (हम सब दाभोलकर)।

जादू टोना विरोधी विधेयक में यह माना जाएगा अपराध
भूत भगाने के नाम पर किसी को मारना या पीटना, पर किसी तरह का मंत्र पढ़ने पर पाबन्दी नहीं होगी।
चमत्कार के नाम पर दूसरों को धोखा देना या पैसा लेना
किसी की जिन्दगी को खतरे में डाल कर अघोरी तरीके का इस्तेमाल करना
भानामती, करणी, जारणमरण, गुप्तधन के नाम से अमानवीय काम करना या नरबलि देना
दैवी शक्ति का दावा होने के नाम पर डर फैलाना
पिछले जन्म में पत्नी, प्रेमिका या प्रेमी होने का दावा कर या बच्चा होने का आश्वासन देकर संबंध बनाना
उंगली से आपरेशन का दावा करना
गर्भवती महिलाओं के लिंग परिवर्तन का दावा करना
भूत पिशाच का आवाहन करते हुए डर फैलाना
कुत्ता, बिच्छू, सांप काटने पर दवा देने से मना करके मंत्रा द्वारा ठीक करने का दावा करना
मतिमंद व्यक्ति में अलौकिक शक्ति का दावा कर उस व्यक्ति का इस्तेमाल धंधे या व्यवसाय के लिए करना

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सुभाष गाताडे - जाने माने लेखक और प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता , अंग्रेजी में दो किताबें प्रकाशित, हिंदी में पहली किताब शीघ्र ही 
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समयांतर के सितम्बर-२०१३ अंक से साभार 
प्रस्तुतकर्ता Ashok Kumar Pandey 

Sunday, 15 September 2013

ज़मीन का सवाल और आज का सच - गिरिजेश


प्रिय मित्र, गुज़रे हुए कल के ज़मींदारी के ज़माने का कड़वा सच आज भी हम में से हर एक के दिल के एक कोने में करकता और टीसता रहता है. तब जब मालिक के लठैतों द्वारा हरवाह-चरवाह को पेड़ से बाँध कर और बरहे से पीट-पीट कर लाठी के हूरे के ज़ोर पर ज़बरदस्ती बेगार खटाया जाता था. जब ठाकुर ग़रीब की झोंपड़ी के भीतर घुस कर उसकी घरवाली के साथ सोता था. जब छान-छप्पर से लौकी-कोहड़ा तक उतरवा लिया जाता था. जब डांगर खाना पड़ता था और गोबरहा जांते से पीस कर रोटी बनानी पड़ती थी, तब ज़ोर ठाकुर के पास था और ग़रीब आज से कई गुना अधिक लाचार था. मजबूरी थी. पीढी-दर-पीढी उसे ठाकुर के अत्याचार को बर्दाश्त करना ही पड़ता था. तब गरीब की ज़िन्दगी ज़हर थी और उसे जीना और बर्दाश्त करना और भी मुश्किल थी.

मगर अब ज़माना वैसा ही नहीं रहा. वह बहुत हद तक बदल चुका है. ठाकुर तब की तुलना में अपनी कामचोरी के चलते और टूटा है, बिखरा है और और ग़रीब हुआ है. और दूसरी ओर दलित और पिछड़ी जातियों का मेहनती इन्सान देस-परदेस में खटने-कमाने-बचाने के चलते और सशक्त हुआ है. ठाकुर की ज़मीन सिकुड़ रही है. वह बिकती जा रही है और दलित और बीच की जाति के लोग उसे ख़रीद रहे हैं. मगर आज का सच भी कम कडुवा नहीं है. दोनों के गले में ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़े ग़ुलामी के तौक की तरह जकड़े हैं. जिससे निकल कर वे मुक्त नहीं हो सकते. पीढियों से चली आ रही ज़मीन की भूख और किसानी का पिछड़ापन उनके पैरों को गाँव के चकरोड से बाँधे हुए है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश देश के पिछड़े इलाकों में से एक है और आज़मगढ़ उसमें भी एक पिछड़ा इलाका है. यहाँ ज़मीन पर मालिकाने का तीखा ध्रुवीकरण है ही नहीं. अधिकतर मँझोले या छोटे किसान ही हैं. बड़े भूपति इक्का-दुक्का ही हैं. और वे भी महँगे संसाधनों के न जुटा पाने के चलते परम्परागत खेती से ही चिपके हैं. उनके बेटे भी खेती के बजाय कुछ और करने के ही चक्कर में हाथ-पैर मारते रहते हैं. हाँ, रासायनिक खाद, डंकल के बीज, ट्यूबवेल की सिंचाई, ट्रैक्टर से जुताई, और यहाँ तक कि हार्वेस्टर से फसल की कटाई का इस्तेमाल हो रहा है. मगर खेती की वैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल अभी भी बहुत सीमित स्तर पर हो पा रहा है. 

ठाकुर अभी भी अकड़ता है. मगर 'हरिजन उत्पीड़न' के चक्कर में फँसने से सहमता भी है. मालिक किसान अधिक लागत और कम कीमत के बीच पिस रही किसानी के दिवालिया होते जाने के चलते टूटता जा रहा है और मज़दूरी के मनरेगा के दबाव में बढ़ जाने के बाद मुश्किल से मिल सकने वाले मज़दूर को भी काम पर न रख सकने की हालत में बदहवास होने की हद तक जा पहुँचा है. मगर अभी भी उसमें अपने भूपति होने का दम्भ बचा है. 

और दूसरी ओर किसी तरह से गाँव में ज़िन्दा बचे हुए और पेट की भूख न सह सकने के चलते और और अधिक कमाने के लालच में बम्बई, दिल्ली और कलकत्ता से लेकर पंजाब और हरियाणा के खेतों तक में अपनी भरी जवानी बेचने और परदेस में भी लुट-पिट जाने के बाद थक-हार कर मन मार कर पके बालों के साथ मज़बूरी में दुबारा लौट कर गाँव में फिर से बसे हुए खेत-मज़दूर की मार्मिक वेदना की त्रासद यन्त्रणा है. 

इस इलाके में भी गाँव की ज़मीन पर आज भी लगातार तनाव बना रहता है. हारने और जीतने वाला प्रधान, नेता, दलाल, थाना, वकील - सब के सब घात लगाये जाल बिछाते रहते हैं. भूपति के खोखले दम्भ और शोषित-उत्पीड़ित दलित के आहत स्वाभिमान के बीच तनी-तना अभी भी रोज़-ब-रोज़ की ज़िन्दगी में कदम-दर-कदम कडुवाहट घोलते हुए बरक़रार है. ठाकुर पहले जितना गरजता था, अब उतना कड़कता नहीं है. वह अब चालाकी से मीठी छुरी चलाता है. मगर उसकी शातिर नज़र का काइयाँपन है कि छिपाये नहीं छिपता. 

दलित भी तो सच जानता ही है. मायावती ने बल दिया है. मगर रोटी तो ठाकुर के खेत में खटने पर ही मयस्सर होनी है. सो मजबूरन सोच-समझ कर मुँह जाब कर ठाकुर की अकड़ को बर्दाश्त भी करता है. नेता उसकी जाति का भले ही है. मग़र वह भी सुनता तो ठाकुर की ही है. अधिकारी को भी तो घूस चाहिए ही. टकराने पर गाँव भर से चन्दा जुटा कर बरसों-बरस मुकदमा लड़ना पड़ता है. और जब दो जून के खाने को ही लाले पड़े हों, तो कोई लड़ने को कैसे मन बना सकता है! मगर फिर भी यहाँ-वहाँ इक्का-दुक्का छोटी-मोटी टक्करें होती ही रहती हैं. 

इसीलिये इस इलाके में अभी तक ज़मीन के सवाल पर या खेत-मज़दूरी के सवाल पर कोई बड़ा आन्दोलन खड़ा नहीं हो सका है. मालिक किसान और खेत-मज़दूर दोनों ही एक-दूसरे की औकात जान-समझ रहे हैं. 
- आपका गिरिजेश 

इसी सन्दर्भ में लीजिए पढ़िए दलित-साहित्य की यह लोकप्रिय कविता -

ठाकुर का कुआँ - ओमप्रकाश वाल्‍मीकि

"चूल्‍हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का ।

भूख रोटी की
रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का
खेत ठाकुर का ।

बैल ठाकुर का
हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी
फ़सल ठाकुर की ।

कुआँ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
गली-मुहल्‍ले ठाकुर के
फिर अपना क्‍या ?
गाँव ?
शहर ?
देश ?"

(नवम्बर, 1981)

(कविता-कोश)

यौन-हिंसा - Kalpesh Dobariya


'लैंगिक-शोषण उन्मूलन' का रास्ता समाजवाद से होकर गुजरता है, ना की बुरजुआ महिलावाद से और ना ही बुरजुआ लोकतंत्र के भीतर. 

स्त्री-हिंसा, जिसमे यौन-हिंसा (बलात्कार) शामिल है, दरअसल वो पुरषवादी समाज का एक उप-उत्पाद है. इसलिए फाँसी बलात्कार की केवल सज़ा हो सकती है, हल नही.

उसका हल है पुरषवादी मानसिकता , जो की मानसिक यौन-विकृति की जन्मदाता है, का ख़ात्मा. पर चूँकि स्त्री-पुरुषो के बीच शक्ति-स्त्रोतो का आसमान वितरण, पुरषवादी अहं और मानसिकता का जन्मदाता है, इसलिए बलात्कार की समस्या का हल प्रमुख रूप से 'शक्ति-स्त्रोतो की आसमान वितरण प्रणाली का ख़ात्मा' हो जाता है, पूंजीवाद का ख़ात्मा हो जाता है, समाजवाद की स्थापना हो जाता है.

जब तक एक लिंग-प्रधानता बनी रहेगी, तब तक बलात्कार भी विध्यमान रहेंगे, क्योंकि यहाँ पुरषवादी सोच नयी पीढ़ी को विरासत मे मिलती है, और इसकी झलक हमे हमारे राजनेताओ के बयानो मे भी मिल जाती है, जो महिलाओ के कपड़ो पर टीका-टिप्पणी करते रहते है.

एक समतामूलक समाज, जहाँ स्त्री और पुरुष दोनो को समान रूप से देखा जाता हो, समाज मे दोनो का समान प्रतिनिधत्व हो, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से भी, जहा एक लिंग-वाद मनुष्य को छूकर भी ना गया हो, ऐसे पर्यावरण मे पला-बड़ा भद्र पुरुष क्या ऐसी घिनौनी हरकत को अंजाम देगा ?

पर निम्न-आर्थिक वर्ग और खाप संस्कृति मे पला-बड़ा व्यक्ति, जो की खुद मानसिक विकृति का शिकार अंजाने मे ही हो जाता है, वो तो किसी लड़की को अपना शिकार बनाएगा ही, बना रहा है, बनाए जा रहा है.

आसमान वितरण प्रणाली के तहत विभिन्न वर्गो मे बँटा हमारा समाज क्या इसका दोषी नही है?

वो स्त्री उस पुरुष का शिकार होती है, उस पुरुष फाँसी दी जाती है, पर जब वो पुरुष इस व्यवस्था का शिकार होता है, तो उस व्यवस्था के लिए फाँसी क्यों नही?

जी नही, मैं बलात्कारियो की ओर से कोई आर्थिक जस्टीफिकेसन नही दे रहा हू.पर बलात्कार को प्रश्रय देनेवाली पूंजीवादी व्यवस्था की ओर ध्यान खींच रहा हू.बलात्कार के आरोपियों को तो फाँसी हो गयी, पर स्त्री-पुरुष के बीच शक्ति-स्त्रोतो का आसमान वितरण, जो की पुरुष-वादी अहं और मानसिक विकृति को प्रश्रय देता है, उसे फाँसी कब ?

बुरजुआ व्यवस्था तो ऐसे समतामूलक समाज की स्थापना नही कर सकती, इसका हल भी समाजवाद मे ही है.जब तक एकाधिकारी पूंजीवादी व्यवस्था बनी रहेगी, बलात्कार होते रहेंगे, प्रशासनिक सक्रियता कुछ हद तक, सिर्फ़ कुछ हद तक कम कर सकती है, ख़त्म नही.

कुछ महाशय कहते है  - "बलात्कार तो तब भी होते थे जब पूंजीवाद का उदय भी नही हुआ था, इसलिए मैं बलात्कार को पूंजीवाद से नही जोड़ सकता"

परंतु महाशय, समाजवाद पूंजीवाद को ख़त्म करके शुरू होगा, पर वहाँ से नही जहाँ से पूंजीवाद शुरू हुआ था, बल्कि वहाँ से जहाँ पूंजीवाद ख़त्म होगा, इसलिए पूंजीवाद के पहले की व्यवस्था पर आधारित सभी तर्क यहाँ अर्थ-हीन हो जाते है. और मैं बलात्कार को पूंजीवाद से नही, समाजवाद से जोड़ कर देख रहा हू.

Kalpesh Patel <krdobariya@gmail.com> By : Kalpesh Dobariya