Sunday, 15 September 2013

यौन-हिंसा - Kalpesh Dobariya


'लैंगिक-शोषण उन्मूलन' का रास्ता समाजवाद से होकर गुजरता है, ना की बुरजुआ महिलावाद से और ना ही बुरजुआ लोकतंत्र के भीतर. 

स्त्री-हिंसा, जिसमे यौन-हिंसा (बलात्कार) शामिल है, दरअसल वो पुरषवादी समाज का एक उप-उत्पाद है. इसलिए फाँसी बलात्कार की केवल सज़ा हो सकती है, हल नही.

उसका हल है पुरषवादी मानसिकता , जो की मानसिक यौन-विकृति की जन्मदाता है, का ख़ात्मा. पर चूँकि स्त्री-पुरुषो के बीच शक्ति-स्त्रोतो का आसमान वितरण, पुरषवादी अहं और मानसिकता का जन्मदाता है, इसलिए बलात्कार की समस्या का हल प्रमुख रूप से 'शक्ति-स्त्रोतो की आसमान वितरण प्रणाली का ख़ात्मा' हो जाता है, पूंजीवाद का ख़ात्मा हो जाता है, समाजवाद की स्थापना हो जाता है.

जब तक एक लिंग-प्रधानता बनी रहेगी, तब तक बलात्कार भी विध्यमान रहेंगे, क्योंकि यहाँ पुरषवादी सोच नयी पीढ़ी को विरासत मे मिलती है, और इसकी झलक हमे हमारे राजनेताओ के बयानो मे भी मिल जाती है, जो महिलाओ के कपड़ो पर टीका-टिप्पणी करते रहते है.

एक समतामूलक समाज, जहाँ स्त्री और पुरुष दोनो को समान रूप से देखा जाता हो, समाज मे दोनो का समान प्रतिनिधत्व हो, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से भी, जहा एक लिंग-वाद मनुष्य को छूकर भी ना गया हो, ऐसे पर्यावरण मे पला-बड़ा भद्र पुरुष क्या ऐसी घिनौनी हरकत को अंजाम देगा ?

पर निम्न-आर्थिक वर्ग और खाप संस्कृति मे पला-बड़ा व्यक्ति, जो की खुद मानसिक विकृति का शिकार अंजाने मे ही हो जाता है, वो तो किसी लड़की को अपना शिकार बनाएगा ही, बना रहा है, बनाए जा रहा है.

आसमान वितरण प्रणाली के तहत विभिन्न वर्गो मे बँटा हमारा समाज क्या इसका दोषी नही है?

वो स्त्री उस पुरुष का शिकार होती है, उस पुरुष फाँसी दी जाती है, पर जब वो पुरुष इस व्यवस्था का शिकार होता है, तो उस व्यवस्था के लिए फाँसी क्यों नही?

जी नही, मैं बलात्कारियो की ओर से कोई आर्थिक जस्टीफिकेसन नही दे रहा हू.पर बलात्कार को प्रश्रय देनेवाली पूंजीवादी व्यवस्था की ओर ध्यान खींच रहा हू.बलात्कार के आरोपियों को तो फाँसी हो गयी, पर स्त्री-पुरुष के बीच शक्ति-स्त्रोतो का आसमान वितरण, जो की पुरुष-वादी अहं और मानसिक विकृति को प्रश्रय देता है, उसे फाँसी कब ?

बुरजुआ व्यवस्था तो ऐसे समतामूलक समाज की स्थापना नही कर सकती, इसका हल भी समाजवाद मे ही है.जब तक एकाधिकारी पूंजीवादी व्यवस्था बनी रहेगी, बलात्कार होते रहेंगे, प्रशासनिक सक्रियता कुछ हद तक, सिर्फ़ कुछ हद तक कम कर सकती है, ख़त्म नही.

कुछ महाशय कहते है  - "बलात्कार तो तब भी होते थे जब पूंजीवाद का उदय भी नही हुआ था, इसलिए मैं बलात्कार को पूंजीवाद से नही जोड़ सकता"

परंतु महाशय, समाजवाद पूंजीवाद को ख़त्म करके शुरू होगा, पर वहाँ से नही जहाँ से पूंजीवाद शुरू हुआ था, बल्कि वहाँ से जहाँ पूंजीवाद ख़त्म होगा, इसलिए पूंजीवाद के पहले की व्यवस्था पर आधारित सभी तर्क यहाँ अर्थ-हीन हो जाते है. और मैं बलात्कार को पूंजीवाद से नही, समाजवाद से जोड़ कर देख रहा हू.

Kalpesh Patel <krdobariya@gmail.com> By : Kalpesh Dobariya

बेरोजगारी का दंश झेलते युवा - बृजेश राव



नौजवान साथियो,

हमारे सामने बड़े संकट का समय है। आज हमारे और हमारे माता-पिता के सपने चूर-चूर हो रहे हैं। हमारे माता-पिता ने समना देखा था कि हमारा लड़का या लड़की आगे चलकर नौकरी करेगा, जिससे परिवार की गरीबी दूर होगी और उनका बुढ़ापा आराम से कटेगा। इसलिए उन्होंने दिन-रात महनत करके जितना हो सका पढ़ाया लिखाया। लेकिन इतना पढ़ लिखने के बाद भी आज नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। आज हर साल लाखों युवा पढ़ लिखकर स्कूल-कालेजों से निकल रहे हैं लेकिन रोजगार मुश्किल से हजारों को मिल पा रहा है।

ऐसी स्थिति में आज का नौजवान हताशा और हीनभावना का शिकार हो रहा है। उसे लगता है कि हमें रोजगार नहीं मिल रहा है तो इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। माता-पिता भी यही समझते हैं कि लड़का मेहनत से नही पड़ता है इसलिये नौकरी नहीं मिल रही है। लेकिन प्यारे नौजवान साथियों इसके लिये न तो हम नौजवान जिम्मेदार है और न ही हमारे माता-पिता।

साथियो इसके लिऐ जिम्मेदार है हमारी सामाजिक व्यवस्था। हम सब नौजवान बचपन से सपना देखते है कि हम बड़े होकर नौकरी करेंगे और अपने माता-पिता को सुख देंगे। हम सोचते हैं कि नौकरी लगने पर हम अपनी बहन की शादी बड़े धूमधाम से करेंगे। हमारी इच्छा रहती है कि नौकरी लगने पर हम अपनी माता-पिता का ढंग से इलाज करायेगें लेकिन पढ़ लिखकर जब हम नौकरी की तलाश में निकलते हैं हमारे सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं। जब हमारे सपने चकनाचूर होते हैं तो हमारे चेहरे उतर जाते हैं और हम हीन भावना और कुण्ठा के शिकार हो जाते हैं। इस कुण्ठा से उबरने के लिए अक्शर हम नशे की ओर मुड़ जाते हैं। लेकिन ये सब करने से मुख्य समस्या का समाधान नहीं होता। हम जीवन भर गरीबी में जीते रहते हैं और हमारे परिवार के सदस्य कमजोर और बीमार सदस्य मौत के मुंह में समा जाते हैं। साथियो, कभी-कभी ऐसा भी होता है हम हमारे भाई-बहन, माता-पिता या बच्चे, बीबी बगैर इलाज के मर जाते हैं और हम पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ता है लेकिन इस दुःख को अमीर आदमी कैसे समझ सकता है क्योंकि जो आदमी पैरो में जूती पहने है, वह कैसे समझेगा कि नंगे पैरों में कील की चुभन कैसी होती है।

नौजवान साथियो, आइए हम समझते हैं कि हमारी बेरोजगारी के लिये वर्तमान सामाजिक व्यवस्था जिम्मेदार किस तरह है - 

सर्वप्रथम तो हमारे यहां जमीन का असमान वितरण है। किसी-किसी के पास तो इतनी जमीन है कि वह मजदूरों से काम करवाकर बड़े आराम से जीवन-यापन करता है। इसके साथ-साथ किसी-किसी के पास आय के अन्य बहुत से साधन होते हैं। यदि जमीन और आमदनी के अन्य साधनों का बटवारा ही सही ढंग से हो जाये 95 प्रतिशत बेरोजगारी खत्म की जा सकती है। जैसे जमीनों पर सिर्फ उन्हीं लोगों का हक हो जिन्हें इसकी जरूरत है और जो खेती का काम करना चाहते हैं। लेकिन आज हम देखते हैं कि एक आदमी है जिसके पास 500 बीघा जमीन है। उसी के पास पेट्रोल पम्प है, उसी के पास गैस एजेन्सी है, उसी के पास ठेकेदारी है, उसी के घर में नौकरियां है, इत्यादि। ऐसी स्थिति में सबको आमदनी के साधन कैसे मिलेंगे। इसलिये सबसे पहले होना चाहिए, जमीन का बंटवारा, उसके बाद आमदनी के अन्य साधनों का बंटवारा।

इसके अलावा एक समस्या यह भी है कि रोजगार का साधन तो है कि उससे इतनी आमदनी नहीं होती कि परिवार का खर्चा आराम से चल सके।

जैसे कुछ लोग फैक्ट्रियों-कारखानों में काम करते हैं लेकिन उन्हें इतना पैसा नहीं मिलता जिससे कि उनके परिवार का गुजारा आराम से हो सके। फैक्ट्री मालिक जब चाहे मजदूर को निकाल देता है और मजदूर दर-दर भटकने को विवश हो जाता है। मजदूर दिन-रात महनत करके अपने मालिक की सम्पत्ति बढ़ाता रहता है और इसी महनत के कारण पूंजीपति लखपति से खरबपति बन जाता है, लेकिन मजदूर खाकपति ही बना रहता है। मालिक के 10-10 फैक्ट्रियां और बंगले हो जाते है लेकिन मजदूर झोपड़े में ही जीवन जीता रहता है। 

नौजवान साथियो, सोचिए एसी स्थिति में हमारी बेरोजगारी, हमारे दुःखों के लिए जिम्मेदार कौन है? यदि आपको लगता है कि इसके लिए हमारी सामाजिक व्यवस्था जिम्मेदार है तो हमारा फर्ज बनता है कि हम ऐसी सामाजिक व्यवस्था को मिट्टी में मिला दें और एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करें, जिसमें कोई बेरोजगारी न हो, कोई दुःखों में न जिये।

नौजवान साथियो, अब कुछ करना ही होगा वरना कब तक हमारी पीड़ियाँ इन दुःखों को सहती रहेंगी। साथियो यदि हम सब मिलकर अपना हक लेने के लिए संघर्ष करने के लिए तैयार हो गये तो दुनिया की कोई भी ताकत नहीं है जो हमें हमारे अधिकारों को वंचित कर सके।

साथियो, आज हम सबको शहीद भगतसिंह बनने की आवश्यकता है, क्योंकि भगतसिंह ने भी शोषण विहीन समाज की स्थापना का सपना देखा था और आहवान किया था -

"यदि किसी देश की सरकार उस देश की जनता की बुनियादि सुविधाओं को पूरा करने में असफल हो तो उस देश की जनता का कर्तव्य ही नहीं बल्कि यह अधिकार बनता है कि वह ऐसी किसी भी सरकार को जड़ से उखाड़ फेंके।"

नौजवान शक्ति जिन्दाबाद

सम्पर्क-

बृजेश राव 

मो 0 9506341287


E-mail: brijeshrao.rao@gmail.com

हिन्दू-स्थान की ओर दूसरा कदम - आशुतोष कुमार


मुजफ्फरनगर हिन्दोस्तान को हिंदू-स्थान ( हिन्दू राष्ट्र ) में बदलने की ऐतिहासिक मुहिम का दूसरा मुकाम है . पहला मुकाम था - अयोध्या (1992).



अयोध्या में संविधान को ध्वस्त किया गया था, मुजफ्फरनगर में संस्कार को .

अयोध्या ने आज़ादी की लड़ाई की विरासत से निकले धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक आश्वासन को खत्म किया . उसने अल्पसंख्यकों के इस भरोसे को खत्म किया था कि भारतीय राज्य-संस्थाएं भारतीय लोकतंत्र को 'बहुसंख्यकवाद की तानाशाही ' में बदल जाने से बचा लेंगी .

इस विश्वासघात के वे सारे राजनीतिक-सामाजिक नतीजे निकले , जिनकी कल्पना अयोध्या के योजनाकारों ने की होगी .

नरेंद्र मोदी इसी अयोध्या की देन हैं , जो पहले ही प्रधानमंत्री - कम से कम मध्यवर्ग के सपनों के - बन चुके हैं ! वे भावी हिन्दू-स्थान के सब से बड़े भावी सम्राट हैं . वे किसी हद तक ठीक कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनना उनका सपना नहीं है . उनका सब से बड़ा सपना है - हिन्दू राष्ट्र या हिन्दू -स्थान .आज़ादी की लड़ाई के सभी मूल्यों और निशानों से मुक्त भारत . वह बन जाए , तो उसका शासक कौन बनेगा , यह खास मायने इसलिए भी नहीं रखता कि जगजाहिर है .

जिस भरोसे पर आज़ाद हिन्दोस्तान का लोकतंत्र कायम था , उसे तोड़ कर हिन्दू-स्थान की मुहिम ने अपना पहला पड़ाव पार किया . लेकिन हिन्दोस्तान की बुनियाद संविधान और भारतीय लोकतंत्र से अधिक गहरी थी . वह टिकी हुई थी हज़ारों वर्षों की उस हिन्दुस्तानी तहजीब - भारतीय संस्कृति - पर , जो अलगाव पर नहीं , लगाव पर कायम थी .

हिन्दुस्तानी गाँव लगाव की हिन्दुस्तानी तहजीब के सब से मज़बूत किले थे . किसान उस तहजीब के सब से बहादुर पहरेदार थे . हिन्दू-स्थान के निर्माण के लिए हिन्दुस्तान के इस असली किले पर कब्ज़ा करना जरूरी था . यह काम बाकी था .

मुजफ्फरनगर ने यह काम शुरू कर दिया . हम तब भी मुंह ताकते रहे थे , अब भी मुंह ताक रहे हैं .

क्योंकि हम संघ-परिवार की सांस्कृतिक राजनीति को न ठीक से समझ पाते हैं , न उस से निपटने का हमने कोई तरीका खोजा है . क्योंकि यह सांस्कृतिक राजनीति अदृश्य रह कर काम करती है . उसके नतीजे , कैंसर की तरह , केवल अंतिम अवस्था में उजागर होते हैं , जब उसका असल में कुछ ख़ास नहीं किया जा सकता .

अयोध्या-अभियान के पीछे योजनाबद्ध तरीके से धीमे-धीमे रचा और प्रचारित किया गया एक 'काल्पनिक इतिहास' था .

मुजफ्फरनगर के पीछे योजनाबद्ध तरीके से धीमे-धीमे रचा और प्रचारित किया गया एक एक 'काल्पनिक समाजशास्त्र ' है . लव जिहाद .

अयोध्या के बाद के दौर में इस ख्याल को पहलेपहल दक्षिण भारत से फैलाना शुरू किया गया. धीमे धीमे. इसकी कमान सम्हाली सनातन संस्था और उसके मंच हिन्दू जनजागृति समिति ने . केरल और कर्नाटक समेत समूचे दक्षिण भारत में लव-जिहाद का हल्ला मचाया जाता रहा . यह हल्ला इतना भरोसेमंद होता चला गया कि मार्क्सवादी मुख्यमंत्री अच्युतानंदन तक को इसके वजूद की आशंका सताने लगी . धीमे धीमे .

केरल और कर्नाटक की सरकारों ने बाकायदा विस्तृत जांचें करवाईं .इन जांचों से ऐसी किसी भी घटना , प्रवृत्ति या आन्दोलन का कुछ पता नहीं चला. लेकिन प्रचार चलता रहा . देश के अलावा कुछ विदेशी खबरों को भी इस मुहिम में लपेट कर इस 'काल्पनिक समाज शास्त्र' को एक विश्वव्यापी रूप दे दिया गया . धीमे धीमे .

समूचे पश्चिमी उत्तरप्रदेश में पिछले कुछ महीनों से जो आग सुलग रही है , जिसकी परिणति मुजफ्फरनगर के रूप में सामने है , वह इस काल्पनिक समाजशास्त्र का सीधा नतीजा है . पूरे इलाके में लगातार हो रहे महापंचायतों/ खापपंचायतों में एक ही नारा गूंजता है - बेटी बचाओ , बहू बचाओ . ( किस से ? लव जिहाद से !)

इस काल्पनिक समाजशास्त्र के कारण यह माहौल बन पाया है कि गाँवोंकस्बों- गलीकूचों की प्रेम कहानियां , छेड़छाड और यौनअपराध कभी भी भीषणतम दंगों की शक्ल ले सकते हैं .

यानी जिन प्रेम-कहानियों की संभावना (मात्र) हिन्दुस्तानी समाज को बचाए और बनाए हुए थीं , उन्ही की 'आशंका' हिन्दू-स्थान के निर्माण की मजबूत नीव बन रही है. यही है संस्कृति की भयावह राजनीति .

अभी तक तो हम कभी गुमसुम कभी बेचैन , कभी स्तब्ध कभी चीखते चिल्लाते , कभी सन्न कभी बहसन्न, तमाशा ही देख रहे हैं .

2014 - भाजपा मुक्त भारत की ओर - आशुतोष कुमार



मैंने आजीवन आडवानी से नफरत की है. अगले जन्मों में भी करूँगा.(अगर विधाता ने मुझे और जन्म देने का दुस्साहस किया.)
क्योंकि वे बाबरी मस्जिद-विध्वंस के मुख्य खलनायक हैं.
विध्वंस विभाजन के बाद देश की सब से बड़ी दुर्घटना है.
विभाजन तो ज्यादातर देश की जमीन पर हुआ था, विध्वंस हुआ था अंतर्मन में. 
आज़ादी के बाद के सब से बड़ा जनसंहार गुजरात २००२ के लिए भी मोदी से ज़्यादा आडवानी जिम्मेवार हैं, क्योंकि वह भी आखिरकार विध्वंस का ही एक सियासी नतीजा था.
लेकिन शैतान को भी उसका हक मिलना चाहिए - यह एक अंग्रेज़ी कहावत है.
इस लिहाज से भाजपा के लिए आडवानी से अधिक पूजनीय कोई और नेता नहीं हो सकता. उन्होंने अकेले दम पर एक नामनिहाल पार्टी को राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति में बदल दिया. भले ही बाबरी आन्दोलन जैसे कलंकित अभियान की बदौलत.
उस वक्त वे चाहते तो भाजपा का पीएम उम्मीदवार बनने से उन्हें अटलबिहारी भी न रोक सकते थे, जैसे आज मोदी को खुद आडवानी नहीं रोक पाए.
लेकिन आडवानी ने दूरगामी पार्टीहित का ख्याल कर न केवल ऐसी कोई कोशिश न की, बल्कि खुद ही अटल का नाम आगे कर दिया. भाजपा के लिहाज से यह सही कदम था, क्योंकि समावेशी भारतीय संस्कृति में फिरकापरस्ती कुछ समय की ताकत तो दे सकती है, लेकिन दूर तक टिकी रहने वाली जमीन नहीं.

इसी समझ को वे एनडीए - एजेंडा, जिन्ना-बयान आदि से आगे बढाते हुए एक 'राइट टू द सेंटर ' ( मध्य-दक्षिण ) पार्टी के रूप में भाजपा को एक राष्ट्रीय विकल्प की तरह तैयार करने में जुटे रहे.
आज भाजपा में इस बात को समझने वाला उनके सिवा और कोई चिड़िया का पूत नहीं है.
आडवानी के जीवन भर के कामकाज को समझने वाला कोई बंदा यह नहीं कह सकता कि उनका मोदी की उम्मीदवारी का विरोध कुर्सी की लालसा के चलते है.
बल्कि यह ठीक उसी समझदारी के चलते है, जिस से एक समय उन्होंने खुद की जगह अटल का नाम आगे किया था. अगर तब उन्होंने ऐसा न किया होता तो भाजपा आज भी बस एक नामनिहाल पार्टी ही होती.
 
आज भाजपा उस आडवानी को एक खास जगह पर पाद-प्रहार का निशाना बनाते हुए, एक ऐसे आदमी के सामने बिछी जा रही है, जिसने जीवन भर विचारधारा, पार्टी और वफादारी जैसी चीजों को सिर्फ और सिर्फ खुद अपने को आगे बढाने के लिए पूरी बेशर्मी से इस्तेमाल किया.
 
इस आदमी ने सिर्फ कुर्सी की लालसा में भाजपा के राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगाते हुए उसे फिर से एक धुर-दक्षिणपंथी ध्रुव में बदल दिया है.
यह भाजपा की सभी संभावनाओं का अंत है.
२०१४ निश्चय ही एक भाजपा-मुक्त भारत का प्रस्थानबिंदु बनेगा.
यह मेरे लिए परम संतोष की बात है. 

इतिहास का यही न्याय है. और सही न्याय है.
आखिर आडवानी ने ही उस सियासत को जन्म दिया था, जिसकी अंतिम परिणति किसी हिटलरनुमा भस्मासुर में होनी तय थी.

Friday, 13 September 2013

उम्मीद के साथ एक अनुरोध : गिरिजेश


—:प्रो-पीपल सॉलिडेरिटी फोरम:—
(अगेन्स्ट एक्स्प्लॉयटेशन, ऑप्रेसन ऐन्ड कम्यूनल हेट्रेड)
प्रिय मित्र, आप सब ने ‘प्रो पीपल सॉलिडेरिटी फोरम’ के गठन का स्वागत जिस उत्साह के साथ किया है, मैं उसके लिये आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ. आज के अतिशय जटिल और संश्लिष्ट सामाजिक ताने-बाने की बेतहाशा उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने की सामूहिक कोशिश ही आज के भीषण दौर का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य-भार है. इस दायित्व का निर्वाह हम सब को मिल-जुल कर करना ही होगा. अगर हम सॉलिडेरिटी के इस प्रयास में सफल हुए, तो प्रतिवाद के जन-स्वर को और भी सशक्त कर सकेंगे. 

अतएव मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि शोषण, उत्पीड़न और साम्प्रदायिक नफ़रत के ख़िलाफ़ जनपक्षधर एकजुटता के लिये गठित किये जा रहे इस फ़ोरम को सुचारु रूप से चलाने और इसे और बेहतर गति और दिशा देने के लिये आप भी इस सामूहिक पहल में अपनी सक्रिय भागीदारी करें. इस परिवर्तनकामी टोली के एक ज़िम्मेदार सदस्य के तौर पर नेतृत्व का दायित्व ग्रहण करें. 

आपको अपनी दैनन्दिन गतिविधियों की व्यस्तताओं के बीच ही इस अभियान की ज़िम्मेदारी को भी हाथ में लेना ही होगा क्योंकि आने वाली पीढ़ी की नज़रों में हम इतिहास के अपराधी के रूप में उपहास का पात्र बन कर इस दुनिया से चुपचाप नहीं गुज़र जाना चाहते हैं. हम सब की यह अपेक्षा है कि इस अभियान में आप के मार्गदर्शन और आप की सक्रिय भागीदारी से हम सभी को और भी बल मिलेगा.

इस फोरम के लिये यह ब्लॉग बनाया गया है. आप की सुविधा के लिये इस ब्लॉग में दाहिनी तरफ़ ऊपर ही ब्लॉग के ‘प्रतीक चित्र’ में फ़ोरम का ई-मेल का भी लिंक (ppsfindia@gmail.com) भी दे दिया गया है. कृपया अपने महत्वपूर्ण लेख इस ई-मेल के पते पर भेजें. हमारी भावी योजनाओं की और आगे की सम्भावनाओं के बारे में और जानकारी के लिये कृपया इस लिंक पर जायें. 

Sunday, 8 September 2013

दंगा: जैसा हमने झेला - गिरिजेश



प्रिय मित्र, आज मुझे अपने शहर के दंगे की भी याद आ रही है. यह कविता आज़मगढ़ में हुए दंगे के दौरान लिखी गयी थी. इसमें वर्णित सारे तथ्य आखों देखे हैं. आज़मगढ़ के आर.एस.एस. के लोग मेरे निकट परिचय में दशकों से हैं. शिबली कॉलेज का दंगा मेरे देखते-देखते ही हुआ था. उसमे लाउडस्पीकर लगा कर ज़बरदस्ती ‘वन्देमातरम्’ शिबली कॉलेज पर बजाया गया था. बाकायदा गोलियाँ चली थीं, दूकाने जलाई गयी थीं, लोग मारे गये थे. कर्फ्यू लगा था. बच्चों को स्कूल से उनके घर तक मैंने खुद मुसलमानों के मुहल्लों में से होकर पहुंचाया था. मुसलमानों के घरों के सामने खड़े होकर ईंटें, पत्थर और गोलियाँ चलाई गयी थीं. बसों में से उतार कर बूढ़े मुसलमानों से ‘जय श्री राम’ कहलवाया गया था और उनको पीटा गया था. पूरी रिपोर्ट आँखों देखी है. यहाँ जब भी दंगा होता है - मैं जानता हूँ ज़िम्मेदार कौन रहता है. मैंने दोनों पक्षों के लोगों को साथ बैठाने की कोशिश भी किया था. मगर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोगों ने सुरक्षा की गारन्टी देने पर भी मुसलामानों के साथ बात करने से स्पष्ट इंकार कर दिया था. इससे अधिक इस मामले में कुछ भी कहना अनावश्यक है..

दंगा -1 
देखो बच्चो, दंगा आया, सबको करता नंगा आया। 
ईश्वर-अल्ला आज लड़ रहे, बच्चों का नुकसान कर रहे।

स्कूलों को बन्द कराया, बन्द हो गयी सभी पढ़ाई।
हिन्दू-मुसलिम-सिक्ख-ईसाई, कैसे हैं हम भाई-भाई?

आपस में कर रहे लड़ाई, कर्फ्यू लगा, मुसीबत आई।
देखो बच्चो, दंगा आया, दाढ़ी-चोटी को लड़वाया। 

लोगों में नफ़रत भड़काया, लोगों में दहशत फैलाया।
लाया पुलिस, पी0ए0सी0 लाया, लड़कों पर लाठी चलवाया।

सबकी होने लगी पिटाई, भागो बच्चो, आफ़त आयी।
कर्फ्यू-पास देख कर पीटा, भरा दूध का लोटा छींटा। 

कितनी ज़ालिम जन-सेवकाई? अब तक होती पीठ-सेंकाई।
पीट दिया बीमारों को भी, लूट लिया बेकारों को भी। 

बस में खोज-खोज कर मारा, सरे-आम पाया दुत्कारा।
जहाँ कहीं भी दाढ़ी देखा, भागे-दौड़े उसको छेंका। 

‘‘जय श्रीराम’’ कहा कर छोड़ा, टाँगें तोड़ीं, सिर भी फोड़ा।
एक कुआँ है शहर में ऐसा, किसने बनवाया है वैसा? 

उसमें भी थी लाश सड़ गयी, जाने कैसे वहाँ पड़ गयी? 
कौन मरा? किसने मरवाया? कोई अब तक जान न पाया।

गोली छत पर चढ़ कर चलती, ऐसा भी कैसा भाई है? 
जो गोली खाने आया था, वह भी क्या वैसा भाई है?

जो मज़दूर कमाते-खाते, दिन भर खटते, तब घर जाते, 
रेड़ी-पटरी-ठेला-झल्ली-गुमटी से रोटियाँ जुटाते। 

वे भी तो मायूस हो गये, जाड़े में अध-पेट सो गये।
बन्द पड़े थे अस्पताल में, डाॅक्टर और मरीज़ों वाले। 

कैसे उनको मिलीं दवाएँ, कैसे उनको मिले निवाले?
घर में सारा शहर कैद था, सड़कों पर सन्नाटा छाया। 

देखो बच्चो, दंगा आया, सबको करता नंगा आया। 

दंगा - 2
कितने बड़े डकैत डाॅक्टर? सभी गाड़ियों में चलते हैं। 
जनता के गुस्से से डरते, गुण्डों की जेबें भरते हैं। 

दंगे ने इनको भी छेड़ा, शीशे फोड़ा, कारें तोड़ा। 
दूकानों में आग लगाया, इनमें भी दहशत फैलाया।

कहाँ ग़लत इनका नुकसान? शोषण करते सीना तान। 
इतना पैसा कहाँ से लाते? इनके नखड़े बढ़ते जाते।

महँगी दवा, फ़ीस भी महँगी, इनकी एक-एक चीज़ भी महँगी। 
बिस्तर-चार्ज होटलों से भी ये हैं महँगा करते जाते।

जब भी इनकी होती मर्ज़ी, जाँच कराया करते फ़र्ज़ी। 
ख़ूब कमीशन हैं ये खाते, तनिक भी नहीं हैं शरमाते।

इनकी लूट अभी है जारी, क्योंकि जान सभी को प्यारी। 
ख़ुद को ख़ुदा के बाद बताते, यमदूतों से भी बढ़ जाते।

बीमारों को दवा बाँटते, मगर नहीं क्या जेब काटते? 
इन्सानों की जान बचाते, मगर नहीं इन्साँ रह पाते।

तो क्या इनकी लूट सही है? क्या इनकी यह अकड़ सही है? 
क्या ये धन-पशु नहीं बन चुके? ख़ुद ही खाईं नहीं खन चुके?

दंगा - 3 
आया हिन्दू-मुसलिम दंगा, नेता नंगे, अफ़सर नंगा। 
घूस के अड्डे पहले खोला, घूस के दम पर इनका मेला।

स्कूलों को बन्द छोड़कर बेचारे भोले बच्चों को 
थोड़ा पीछे और ढकेला, इनकी करनी बढ़ा झमेला।

आओ बच्चो, सुनो ज़बानी, कक्षा दस की नयी कहानी। 
देर से मिलीं किताबें उनको, बोर्ड ने नया कोर्स चलवाया।

और छुट्टियों के चलते भी कोर्स नहीं पूरा हो पाया। 
मगर परीक्षा तो देनी है, मार्च अन्त में ही होनी है।

उनके संग तो खेल हो गये, कैसे बच्चे फ़ेल हो गये? 
जब रिज़ल्ट पायेंगे बच्चे, किस पर गुस्सायेंगे बच्चे?

दंगा - 4 
आर0एस0एस0 दंगा करवाता, जहाँ कहीं भी मौका पाता। 
उसके गुण्डों का कहना है, ‘‘मुसलमान को यदि रहना है,

‘‘जय श्री राम’’ सुनाना होगा, वरना उन्हें भगाना होगा। 
केवल हिन्दू सदा सही है, हिन्दू तो लड़ता ही नहीं है।’’ 

सीधा-सादा भोला-भाला इनका हिन्दू सारा ही है!
याद करो सन् चैरासी को, किसने सिक्खों को जलवाया? 

जिसने मसजिद को तोड़ा था, उसको कितना सज्जन पाया?
दारा सिंह की गुण्डागर्दी दो बच्चों को फूँक गयी है। 

अभी नहीं है बात पुरानी, यह भी घटना नयी-नयी है।
दारा सिंह भी तो हिन्दू है, और गोडसे हिन्दू ही था! 

गाँधी पर गोलियाँ चला कर जिसने बापू-वध कर डाला!
उसी गोडसे के गुण गा कर आर0एस0एस0 है बात कर रहा? 

हिन्दू-हिन्दू चिल्लाता है, मानवता से घात कर रहा?
शिव-सेना का बाल ठाकरे ज़ोर-ज़बरदस्ती करवाता। 

सबको ही धमकाता रहता, खेलों के मैदान तोड़ाता।
वह भी बच्चो, हिन्दू ही है, साधू बाबा-सा दिखता है। 

क्या वह भी सीधा-सादा है? क्या वह भी भोला-भाला है? 
क्या उस पर ही वार हुआ है? या ‘जन’ का संहार हुआ है?

दंगा - 5 
मुसलमान थे कैसे-कैसे! हमीद, अशफ़ाक, गार्दी जैसे। 
उन पर भी तो ज़ुल्म हुए थे, उनकी भी बोटियाँ उड़ी थीं।

मगर सत्य-पथ के वे राही, नहीं झुका सिर ज़ालिम पाया। 
कट्टरता को धूल चटाया, हरदम अपना फ़र्ज़ निभाया।

कितना अन्धा मुसलमान है? नकली ख़ुदा-ख़ुदा को रटता। 
असली देश हमारा अपना, उसकी जय कहने से डरता।

इस अन्धेपन को भी तोड़ो, वरना कर्ज़ दूध का छोड़ो।
रोटी दिया, अनाज खिलाया, पढ़ा-लिखा कर बड़ा बनाया। 

देश भला क्या नहीं है माता? क्यों जय कहने में शर्माता?
आर0एस0एस0 गुण्डा-टोली, पर ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्र-गान है। 

देश और इसकी सुन्दरता का ही तो इसमें बखान है।
क्या जन-श्रम से जो उपजी हैं, उन फसलों का गीत गलत है? 

क्या जंगल, नदियों, झरनों की सुन्दरता का गीत गलत है?
क्या अपने पुरखांे के घर का गौरव-गान धर्म-द्रोही है? 

अगर यही है धर्म-द्रोह, तो फिर तो बच्चो, यही सही है! 
इसको गाना राष्ट्र-प्रेम है, इसमें ख़ुदा कहाँ घुस आया?

दंगा - 6 
बच्चो, बूढ़ों से मत सीखो, तुमको उल्टा पाठ पढ़ाते। 
इनकी आँखों पर पट्टी है, सच को नहीं जान ये पाते।

ईश्वर-अल्ला तुम्हें सिखाते, स्वर्ग-नरक का झूठ पढ़ाते। 
मीठी-मीठी बोली देखो, फिर भी बातें ग़लत बताते।

कैसा ईश्वर? कौन ख़ुदा है? ऊपर वाला क्यों ऐसा है? 
अल्ला-ईश्वर-गाॅड बन गया, हम सब को उसने बँटवाया।

तेरा-मेरा-उसका कह कर, जन-बल को तोड़ा, लुटवाया। 
ऊपर वाला कहीं नहीं है, नीचे बस इन्सान सही है।

धरम-करम की गप कोरी है, इसने सारा फूस जुटाया। 
मज़हब ही लड़ना सिखलाता, आपस में है बैर बढ़ाता।

जिसका लाभ उठाता नेता, भाषण की गोटी चमकाता। 
नहीं बना इन्सान अभी, जो इन्सानों का घर जलवाता।

घड़ियालों को तो पहिचानो! दाढ़ी-चोटी को तो जानो! 
कब तक इनकी दाल गलेगी? कब तक इनकी ऐश चलेगी?

कब तक चुप रह पाओगे तुम? कब तक यह सह पाओगे तुम? 
कभी तो सच भी गुस्सा होगा, कभी तुम्हारा सिर भी तनेगा।

कभी तो इन्सानों का तेवर इनकी ख़ातिर कहर बनेगा! 
तब फिर ये कैसे अकड़ेंगे? तब फिर ये कैसे लूटेंगे?

तब फिर कैसे ऐश करेंगे? तब फिर घर कैसे फूँकेंगे? 
इनका कुछ तो करना होगा, वरना यूँ ही मरना होगा।

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद एक फौरी अपील - ashok kumar pandey





Ashok Kumar Pandey - 
"हम अपनी खामोशियों के गुनाहगार रहे;
वे जूनून बनके सबके सर पे सवार रहे|
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(मुजफ्फरनगर दंगों के बाद एक फौरी अपील)
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लहू का आदिम खेल फिर ज़ारी है. फिर ज़ारी है अफवाहों का वलवला और पतित राजनीति के षड्यंत्रों का सिलसिला. धरम के नाम पर फिर हथियार निकल गए हैं और इंसानी लाशों की पहचान उनके धार्मिक निशानों की बिना पर कर उन पर अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकने का कारोबार ज़ारी है. गोरख लिख गए थे - 

"इस साल दंगे बहुत हुए हैं/ 
ख़ूब हुई है खून की बारिश/ 
अगले साल अच्छी होगी/
फ़सल मतदान की.."

- तो २०१४ से ठीक पहले यह होना दुखी भले करे, चिंता में भले डाले, गुस्से से भले भर दे लेकिन आश्चर्यचकित तो नहीं ही कर रहा है. 

मुजफ्फरनगर में क्या हुआ...कैसे हुआ..पहले हिन्दू मरा कि मुसलमान. मेरे लिए यह सब कोई मानी नहीं रखता. 

मानी इस बात का है कि दंगे हो रहे थे और प्रशासन अनुपस्थित रहा. जनता के पैसों से चलने वाला शासन जनता के लहू को बेभाव बहने से रोकता नज़र नहीं आया. सत्ता की अदम्य लालसा से पूरा संघ गिरोह किसी भी हाल में दिल्ली का तख़्त-ओ-ताज़ हासिल करने पर लगा है. उसकी ये हरक़तें लाज़िम हैं. 

लेकिन खुद को सेकुलर कहे जाने वाली ताक़तें अगर उसकी हरक़तों पर बंदिश नहीं लगा पातीं तो यह गुनाह में शामिल होना क्यों न माना जाय? आखिर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण दुधारी तलवार है जो दोनों मज़हबों को ध्रुवीकृत कर जनता के असली मुद्दों को कूड़ेदान में डालने का काम करता है.

इतनी मंहगाई, इतनी बदहाली और देखते देखते एक एक करके जनता के सारे मुस्तक़बिल को बाज़ार के हवाले कर दिए जाने का कोई विरोध संभव नहीं होता. ज़िन्दगी भर के श्रम के बाद हासिल पेंशन हमारे सामने सामने पूंजीपतियों के जूए के लिए मूलधन बन गयी और हम सब ख़ामोश! लेकिन धर्म के नाम पर सबके हाथों में तलवारें आ जाती हैं. हर कोई पत्रकार, हर कोई रिपोर्टर, हर कोई नेता और हर कोई योद्धा! 

तो सोचना तो हमें भी होगा कि यह मज़हबी जूनून हमारी इतनी कमज़ोर नस कैसे बनता चला जाता है कि हमारे गले पर जकड़ी हथेलियाँ इसे धीरे से दबाती हैं और हम उन्हीं की भाषा बोलने लगते हैं?आज से लेकर अगले चुनावों तक यह मसअला बार-बार सामने आना है. सोचना हमें है कि हमें क्या करना है? क्या हम इस मज़हबी जूनून की बीमारी के इतने एडिक्ट हो चुके हैं कि अब कोई इलाज़ नहीं? क्या लहू हमारे नेताओं के साथ साथ हमारे भी मुंह लग गया है...या कभी हम हाथ में हाथ डालकर इसके खिलाफ़ आवाज़ भी लगायेंगे? 

बकौल पाश -

"आदमी के ख़त्म होने का फैसला वक़्त नहीं करता, 
हालात नहीं करता वह खुद करता है; 
हमला और बचाव, 
दोनों आदमी ख़ुद करता है|" 

September 9, 2013