Monday, 11 November 2013

देश के हर मुसलमान तक पहुँचना चाहिए यह ‘सच’ - Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines



मुसलमानों को इस वक्त क्या चाहिए? किसी विवादित ज़मीन पर बनी मस्जिद जिसमें बमुश्किल 200 नमाज़ी नमाज़ पढ़ पाएं? विधानसभा या संसद में किए गए झूठे वादे या फिर देश के संसाधनों और योजनाओं में अपना हक़?
इस सवाल के जबाव तक पहुँचने में आपकी मदद करने के लिए बस हम कुछ आँकड़े आपके सामने पेश करना चाहते हैं. यकीन जानिए यह आँकड़े पढ़कर आपके सामने नीतीश की टोपी उतर जाएगी, मुलायम आपको कठोर नज़र आएंगे, आज़म खाँ का असली चेहरा सामने आ जाएगा और मुस्लिम परस्त दिखने वाले बाकी सरकारों और नेताओं की बेशर्म हक़ीकत आपके सामने नंगी हो जाएगी.
Indian MuslimsBeyondHeadlines को केन्द्र सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय से सूचना के अधिकार के ज़रिए मिले अहम दस्तावेज़ अल्पसंख्यक़ों के कल्याण के लिए शुरू की गई स्कीमों की हकीक़त बयाँ कर रहे हैं. आप जानेंगे कि कैसे अल्पसंख्यक, खासकर मुसलमानों के कल्याण का दावा करने वाली यह योजनाएं काग़जों में ही दम तोड़ रही हैं. (या नेता इनका गला घोंट रहे हैं.)
बजट सौ करोड़ का पर रिलीज़ हुआ एक लाख और खर्च शुन्य

मुसलमानों के शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक उत्थान के लिए सरकार की कई संस्थाएं व स्कीमें चल रही हैं. उन्हीं संस्थाओं में एक नाम मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन का भी है. अख़बारों के बिके हुए पन्ने इस संस्था की तारीफ़ से भरे मिल जाएंगे, लेकिन हकीक़त यह है कि साल 2012-13 में इस संस्था के लिए 100 करोड़ का बजट पास किया गया, लेकिन रिलीज़ हुए सिर्फ एक लाख रुपये. हद तो यह है कि यह एक लाख रुपये भी खर्च नहीं किए गए. यदि खर्च होते तो किसी ज़रूरतमंद मुसलमान का भला हो जाता, जो शायद न सरकार चाहती है और न ही खोखले दावे करने वाले नेता.
अल्पसंख्यक महिला नेतृ्त्व विकास स्कीम भी महज़ एक दिखावा

अल्पसंख्यक महिलाओं में लीडरशीप डेवलपमेंट को लेकर सरकार द्वारा अल्पसंख्यक महिला नेतृ्त्व विकास स्कीम (Scheme for Leadership Development of Minority Women) शुरू की गई. इस स्कीम के लिए साल 2012-13 में 15 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन जारी किए गए सिर्फ 12.80 करोड़ रूपये और इसमें से भी सिर्फ 10.45 करोड़ ही खर्च किया जा सका.
जबकि इससे पहले के वर्षों में साल 2011-12 में 15 करोड़ का बजट रखा गया और रिलीज सिर्फ 4 लाख ही किया गया. उसी तरह साल 2010-11 में भी 15 करोड़ का बजट रखा गया जबकि रिलीज 5 करोड़ किया गया. यही नहीं, साल 2009-10 में यह बजट 8 करोड़ का था और 8 करोड़ रूपये रिलीज़ भी किया गया. पर जब खर्च की बात आती है तो शुन्य बटा सन्नाटा… सारा धन रखा का रखा ही रह गया. यही हाल साल 2010-11 और साल 2011-12 का भी रहा. यदि यह पैसा खर्च किया जाता तो सकता है कि मुसलमानों में कुछ महिलाओं कौम की रहनुमाई की अहम जिम्मेदारी संभालने के लायक हो जाती. लेकिन शायद हमारे नेता और सरकारे ऐसा नहीं चाहती. उनके लिए तो मस्जिदों की दीवारें और इफ़्तार पार्टियाँ ही अहम हैं.
फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की गई

यही हाल Grant-in-aid to State Channelising Agencies (SCA) engaged for implementation in NMDFC Programme का भी है. इस कार्य के लिए भी साल 2012-13 में 2 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज़ सिर्फ 66 लाख रूपये ही किया जा सका. गनीमत होती कि इसमें से कुछ पैसा जरूरतमंदों पर खर्च कर दिया जाता. लेकिन पूरी बेशर्मी और बेहाई के साथ संबंधित विभाग इस पैसे को दबाए रहा और एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की गई. (यहाँ, यह सवाल करना ही बेमानी है कि जब कोई पैसा ही खर्च नहीं किया गया तो संबंधित विभाग के अधिकारियों ने काम क्या किया, शायद वे नेताओं के लिए वसूली का टारगेट पूरा कर रहे हों.)
रक़म सरकारी खजाने में पड़ी रही

राज्यों के वक्फ़ बोर्डों को मज़बूत (Strengthening of the state Wakf Board) करने के लिए साल 2012-13 में 5 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज़ सिर्फ 10 लाख रूपये ही हुआ. क्या आपको यह बताने की ज़रूरत है कि इस फंड में से एक भी रूपया खर्च नहीं किया गया? और अगर आपको पता चल भी जाए कि इस फंड में से भी एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया तो आप क्या करेंगे? शायद कुछ भी नहीं, क्योंकि हो सकता है आपके लिए भी एक मस्जिद (जो जहाँ, है वहाँ होनी ही नहीं चाहिए थी) की दीवार ही ज्यादा अहम है!
यही नहीं, साल 2010-11 में भी इस मद में 7 करोड़ रूपये का बजट रखा गया लेकिन रिलीज़ हुआ सिर्फ 10 लाख रूपये और यह रक़म भी सरकारी खजाने में पड़ी रही, 2012-13 की तरह ही इस साल भी एक भी पैसा खर्च नहीं किया जा सका. (या जानबूझकर नहीं किया गया)
कौम परस्ती सिर्फ मज़हबी मसाइल को हवा देने तक ही सीमित हैं

सिविल सेवा परिक्षाओं में बैठने वाले छात्रों की मदद के लिए भी सरकार ने बजट निर्धारित किया गया है. (Support for students clearing Prelims conducted by UPSC, SSC, State Public Services Commission etc) के लिए भी साल 2012-13 में 4 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन इसके नाम पर महज़ 2 लाख रूपये रिलीज़ किए गए. और यह दो लाख रूपये भी खर्च नहीं किया जा सका. यदि यह चार करोड़ रुपये खर्च हो जाते तो हो सकता है कि कुछ अल्पसंख्यक छात्र सिविल सेवा परीक्षा पास कर पाते. लेकिन मुस्लिम परस्त होने का दावा करने वाले नेताओं को शायद यह पसंद नहीं है. तब ही तो मुस्लिम कल्याण के उनके नारे सभास्थलों में हवा हो जाते हैं और मुसलमानों के हाथ आती ही सिर्फ मायूसी और बेबसी. अब आज़म खाँ, शफीकुर्रहमान बर्क या असदउद्दीन ओवैसी किसी नेता से इस बारे में सवाल मत कर लेना. वरना उनकी आँखे लाल हो जाएंगी और वे वही आडंबर करने लगेंगे जो संसद में करते हैं. इनके लिए वंदे मातरम का गाया जाना या न गाया जाना तो मु्द्दा है लेकिन मुस्लिम छात्रों के लिए फंड रिलीज न होने शायद कभी मु्द्दा न हो. इनकी कौम परस्ती सिर्फ मज़हबी मसाइल को हवा देने तक ही सीमित हैं.
बजट ही गोल कर दिया गया

कौशल विकास पहल (Skill Development Initiatives) के नाम पर साल 2012-13 में 20 करोड़ रूपये का बजट रखा गया जबकि इसके नाम पर रिलीज हुआ सिर्फ 5 लाख रूपये और इसमें से भी एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया.
छोटे अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में गिरावट रोकने के लिए योजना (Scheme for containing population decline of small minorities) का भी यही हाल है. साल 2012-13 में केन्द्र सरकार के इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज किया गया सिर्फ 1 लाख रूपये. इसी तरह साल 2010-11 में भी इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज किया गया सिर्फ 1 लाख रूपये. और दिलचस्प यह है कि दोनों ही बार एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया. जबकि बाकी के सालों में इसके नाम का बजट ही गोल कर दिया गया.
स्कीम ही गायब हो गई

भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए प्रोमोशनल क्रियाओं (Promotional Activities for Linguistic Minorities) के नाम पर साल 2010-11 में 1 करोड़ रूपये का बजट रखा गया. लेकिन महज़ 5 लाख रूपये रिलीज किया जा सका और बाकी अन्य योजनाओं की तरह ही इस योजना के तहत भी एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया. और इस साल के बाद से इस योजना का बजट ही गोल कर दिया गया या यूं कहिए कि स्कीम ही गायब हो गई.
विदेशों में अध्ययन के लिए शिक्षा ऋण पर ब्याज सब्सिडी (Interest Subsidy on Educational Loans for Overseas Studies) के लिए साल 2012-13 में 2 करोड़ का बजट पास किया गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ दो लाख रूपये. इसी तरह साल 2010-11 में भी में 2 करोड़ का बजट पास किया गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ दो लाख रूपये. इन दोनों वर्षों में खर्च के साथ साथ बाकी के सालों में बजट ही गोल कर दिया गया.
राज्य वक्फ बोर्डों के अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण सिर्फ कागज़ों पर

राज्य वक्फ बोर्डों के अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण (Computerization of records of State Wakf Boards) के लिए साल 2012-13 में 5 करोड़ रूपये का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 1.65 करोड़ रूपये. और इस पैसे को भी देश के तमाम राज्य खर्च नहीं कर सके. देश के तमाम राज्यों में इस मद में मात्र 89 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके. साल 2011-12 की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. इस साल भी 5 करोड़ रूपये का बजट रखा गया. लेकिन रिलीज सिर्फ 2 करोड़ रूपये ही हो सका. और इस 2 करोड़ रूपये को भी देश के तमाम राज्य खर्च नहीं कर सके. सिर्फ 62 लाख रूपये ही देश के तमाम राज्य मिल कर खर्च कर पाएं. साल 2010-11 की कहानी तो और भी हैरान कर देने वाली है. इस साल 13 करोड़ रूपये का बजट रखा गया था. लेकिन रिलीज सिर्फ 6 करोड़ रूपये ही हो सका. और इस 6 करोड़ रूपये में से सिर्फ 3.63 करोड़ रूपये ही देश के तमाम राज्य मिल कर खर्च कर पाएं.
नेताओं से सवाल मत पूछना, उनका गला सूख जाएगा

व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रमों स्नातक और स्नातकोत्तर कोर्सेज के लिए योग्यता सह साधन छात्रवृत्ति योजना (Merit-cum-Means Scholarship for professional and technical courses of under graduate and post graduate) के लिए साल 2012-13 में 220 करोड़ का बजट रखा गया, पर रिलीज़ 184.07 करोड़ ही हुआ. और खर्च 181.21 करोड़ रूपये ही किए गए. बाकी के सालों में स्थिति थोड़ी बेहतर रही. लेकिन साल 2008-09 में इस स्कॉलरशिप के लिए 124.90 करोड़ का बजट रखा गया था, लेकिन रिलीज़ सिर्फ 64.94 करोड़ ही किया गया. शायद ऐसा कोई ही छात्र हो जिसने इस योजना के तहत फार्म न भरा हो और न जाने कितने फॉर्मों को फंड न होने का हवाला देकर रद्द कर दिया गया हो. अब सवाल यह उठता है कि जब पूरा फंड रिलीज ही नहीं किया गया और जो रिलीज हुआ भी वह खर्च ही नहीं किया गया तो फिर फॉर्म रद्द कैसे हो गए? अल्पसंख्यकों की रहनुमाई करने वाले नेताओं से यदि यह सवाल पूछ लिया जाए तो उनका गला सूख जाएगा और अगर बेशर्मी से हलक़ से दो चार शब्द बाहर निकले भी तो एक और नया झूठ ही सामने आएगा. क्योंकि इस मामले में सच्चाई इन रहनुमाओं की खोखली नेतागिरी से भी ज्यादा बेशर्म है.
किसी रहनुमा से इस बजट के बारे में सवाल मत करना

चयनित अल्पसंख्यक बहुल जिलों में अल्पसंख्यकों के लिए बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम (Multi Sectoral Development Programme for Minorities in selected of Minority Concentrated Districts) योजना के लिए साल 2008-09 में 539.80 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 279.89 करोड़ रूपये. जबकि साल 2012-13 में इस स्कीम के लिए 999 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 649 करोड़ रूपये. अब आप किसी रहनुमा से इस बजट के बारे में सवाल मत कर लीजिएगा. यदि सवाल कर लिया तो हो सकता है किसी मस्जिद की टूटी दीवार की ईंट उठाकर ही वे आपके सिर पर मार दें.
नेताओं के फूहड़ भाषणों पर ताली कौन बजाएगा?

पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति (Post Matric Scholarship) योजना के लिए साल 2008-09 में 99.90 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 69.93 करोड़ रूपये. जबकि साल 2012-13 में इस स्कीम के लिए 500 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 340.75 करोड़ रूपये और खर्च 326.55 करोड़ रूपये ही किया जा सका. यदि यह पूरा पैसा रिलीज़ हो जाता तो शायद गरीबों के बच्चे दसवीं के बाद कॉलेज के मुंह देख पाते. लेकिन यदि गरीब अल्पसंख्यकों के बच्चे पढ़ गए तो फिर इन नेताओं के फूहड़ भाषणों पर ताली कौन बजाएगा?
इन तमाम स्कीमों पर एक पैसा खर्च नहीं किया गया 

पिछड़े शहरों के रूप में पहचाने गए 251 में से 100 अल्पसंख्यक बहुल कस्बों/शहरों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई योजना (Scheme for promotion of education in 100 minority concentrate towns/cities out of 251 such town/cities identified as backward) का हाल तो और भी बुरा है. इस स्कीम के लिए केन्द्र सरकार ने 50 करोड़ का बजट रखा लेकिन रिलीज सिर्फ 4 लाख रूपये ही किया गया लेकिन उदासीनता की हद यह रही कि इसमें से एक रुपया भी खर्च नहीं किया गया.
यही हाल एमसीबी/एमसीडी के अंतर्गत न आने वाले गांवों के लिए ग्राम विकास कार्यक्रम (Village Development Programme for Villages not covered by MCB/MCDs) का भी है. इस स्कीम के लिए भी केन्द्र सरकार ने 50 करोड़ का बजट रखा लेकिन रिलीज सिर्फ 4 लाख रूपये ही किए गए. और इन चार लाख में से एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की गई.
एमसीडी में जिला स्तरीय संस्थाओं को समर्थन (Support to district level institutions in MCDs) के लिए भी साल 2012-13 में केन्द्र सरकार ने 25 करोड़ का बजट रखा लेकिन इसमें भी सिर्फ चार लाख ही रुपये रिलीज किए गए जिसमें से एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया. यानि इस योजना का लाभ एक भी व्यक्ति को नहीं पहुँचा.
नौवीं कक्षा की लड़कियों के लिए फ्री साइकिल योजना (scheme of Free Cycles to girl students of class IX) का हाल भी ऐसा ही है. इस स्कीम के लिए साल 2012-13 में केन्द्र सरकार ने सिर्फ 5 करोड़ का बजट रखा गया जिसमें से मात्र चार लाख रुपये रिलीज किए गए और खर्च एक पैसा भी नहीं किया गया.
सच जो हर हिंदुस्तानी अल्पसंख्यक को जानना चाहिए वह यह है कि अल्पसंख्यकों के शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक उत्थान एवं कल्याण के लिए शुरु की गई तमाम सरकारी योजनाओं ने कागजों पर ही दम तोड़ दिया. और हमारे नेताओं ने इनकी फातेहा तक नहीं पढ़ी.
पहले तो बजट ही ऊँट के मुँह में जीरे के समान रखा गया. लेकिन यह जीरा भी ऊँट के मुँह में नहीं गया. इससे भी कड़वा सच यह है कि जो पैसा खर्च हुआ उसका भी बड़ा हिस्सा नेताओं और अफ़सरों की जेब में चला गया.
यदि अब तक बयाँ की गई हकीक़त से आपके गले का पानी सूख गया है तो अब आपके दिल पर पत्थर पड़ने वाले हैं. क्योंकि सबसे शर्मनाक हक़ीकत यह है कि सरकार और नेताओं के पोस्टरों पर जारी किए गए फंड से ज्यादा पैसा खर्च कर दिया गया. लेकिन देश का कोई अखबार या टीवी चैनल आपको यह नहीं बताएगा क्योंकि सरकार की इन लोक लुभावन (लेकिन ज़मीनी स्तर पर शून्य) योजनाओं के विज्ञापन और उनमें चमकने वाले नेताओं के चेहरे इनके ज़रिये ही आप तक पहुँचे. जब टीवी चैनलों और अखबारों को विज्ञापनों के ज़रिए अपना हिस्सा मिल ही गया तो वे असली हक़दारों तक पैसे की पहुँचने या न पहुँचने की चिंता क्यों करें? शायद ही किसी भी टीवी या अखबार का कोई तेज़ तर्रार रिपोर्टर इन आँकड़ों से उपजे सवालों को नेताजी के मुँह पर दागने की हिम्मत न जुटा पाए, क्योंकि उसके चैनल/अख़बार को तो अपना हिस्सा मिल ही गया है.
प्रचार-प्रसार पर पूरा ध्यान

आपको यह जानना चाहिए कि साल 2008-09 में Research/Studies, Monitoring & Evaluation of Development Schemes for Minorities including Publicity के लिए 5 करोड़ रूपये का बजट रखा गया था. लेकिन रिलीज 8.95 करोड़ रूपये किया गया और खर्च भी 7.97 करोड़ रूपये रहा. साल 2009-10 में बजट को बढ़ाकर 13 करोड़ रूपये कर दिया गया. 13 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 11.97 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. साल 2010-11 में बजट को और बढ़ाकर 22 करोड़ रूपये कर दिया गया. 22 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 19.63 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. साल 2011-12 में यह बजट बढ़कर 36 करोड़ हो गया. 36 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 24.48 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. साल 2012-13 में बजट को और बढ़ाकर 40 करोड़ रूपये कर दिया गया. 33.30 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 33.29 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. अब सवाल यह उठता है कि जब मूल योजनाओं का पैसा ही रिलीज नहीं किया गया तो उनके अध्ययन पर यह पैसा कैसे खर्च कर दिया गया. हम कोशिश करेंगे की इसकी पूरी सच्चाई भी आप तक पहुँचे.
यदि आप पिछले 15 दिन से अख़बार पढ़ रहे हैं या किसी भी रूप में ख़बरें देख रहे हैं तो आपको लगेगा कि मुसलमानों के लिए सबसे अहम मसला एक मस्जिद की दीवार है. कम से कम यूपी सरकार को तो यही लगता है. लेकिन आपको यह सवाल भी खुद से करना होगा कि देश के तमाम बड़े अख़बारों में एक मस्जिद की दीवार का गिरना और उसके लिए एक आईएएस अधिकारी का तबादला किया जाना तो खबर बन जाता है लेकिन मुसलमानों के हक़ में पड़ रहा हजारों करोड़ का यह डाका खबर नहीं बन पाता? आखिर क्यों? यदि आपकी समझ इस बुनियादी लेकिन अहम सवाल का जबाव तलाश पा गए तो समझ लीजिए बेदारी की राह में पहला कदम आपने आगे बढ़ा दिया है.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बेशर्मी से कहते हैं कि सांप्रदायिक सौहार्द न बिगड़े इसके लिए उन्होंने अफ़सर का तबादला कर दिया, और वे आगे भी ऐसा ही करते रहेंगे. क्या अखिलेश यादव इस सवाल का जबाव देने की हिम्मत भी जुटा पाएंगे कि मुसलमानों को उनका जायज़ हक़ न देने वाले अफ़सरों के ख़िलाफ़ आज तक उन्होंने क्या कार्रवाई की है? अखिलेश की तो छोड़िये मुसलमानों के सरपरस्त बनने का दावा करने वाले आज़म खाँ भी इस सवाल के जबाव में सिर्फ अपने ख़ाली गिरेबां में ही झाँक सकते हैं. वे अपनी आलोचना में पोस्ट की गई टिप्पणी पर तो किसी आम नागरिक को हवालात की हवा खिला सकते हैं लेकिन मुसलमानों का हक़ डकारने वाले अफ़सरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में उनकी भी घिग्घी बंध जाएगी.
अब सवाल यही उठता है कि जब नेता खामोश हैं, अफ़सर हक़ पर डाका डाल रहे हैं. मुसलमान हुक्मरानों ने बेशर्मी अख़्तियार कर ली है तो फिर हम क्या करें? इसका सीधा सा जबाव यह है कि अब हमें मुश्किल सवाल पूछने की शुरूआत करनी होगी. और ज़रूरी नहीं है कि यह सवाल नेताओं के मुँह पर ही पूछा जाए. आप यह लेख शेयर करके भी ऐसा कर सकते हैं.
यदि आपने यह लेख यहाँ तक पढ़ लिया है तो इस सच्चाई को बाकी देशवासियों तक भी पहुँचाइये ताकि खोखली सरकार, खोखले नेताओं और खोखले मुसलिम हुक्मरानों की सियाह हक़ीकत लोगों के सामने आ जाए और वे असली और अहम सवालों के बारे में सोचना शुरू करें.
(यह आँकड़े पूरे देश के हैं. समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव और आज़म खाँ के नाम का इस्तेमाल मुसलमानों के नाम पर हो रही राजनीतिक को रेखांकित करने के लिए किया गया है. मुसलमानों की बदहाली के लिए बाकी नेता भी इतने ही जिम्मेदार हैं जितना के इस स्टोरी में उल्लेखित किए गए राजनेता.)

Friday, 8 November 2013

सावधान! फ़ासीवादी शक्तियाँ अपने ख़तरनाक खेल में लगी हैं! - मज़दूर बिगुल




सावधान! फ़ासीवादी शक्तियाँ अपने ख़तरनाक खेल में लगी हैं!

इनका निशाना है जनता की एकता!

इनके नापाक इरादों को नाकाम करना ही होगा!

धर्म के नाम आम लोगों को बाँटकर और लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने में लगी ताक़तें अभी भी मुज़फ़्फ़रनगर में साम्प्रदायिक आग ठण्डी नहीं होने दे रही हैं। दशहरे के दिन भी इन्होंने माहौल बिगाड़ने की पूरी कोशिश की। अभी त्योहारों का समय चल रहा है, इसलिए कोई बड़ी बात नहीं होगी कि ये मानवद्वेषी लोग फिर से किसी किस्म का साम्प्रदायिक फ़साद खड़ा कर दें। लेकिन मुज़फ़्फ़रनगर के दंगे इस साल की पहली साम्प्रदायिक घटना नहीं है। इस साल अगस्त महीने तक पूरे देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 479 घटनाएँ हो चुकी हैं जिनमें 93 तो उत्तर प्रदेश में हुई हैं। 2012 का साल भी ऐसा ही गुज़रा था, तब साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं की संख्या 640 रही थी।

भारत में साम्प्रदायिकता का खेल सभी राजनीतिक पार्टियाँ खेलती हैं, मगर यहाँ फ़ासीवादी राजनीति का केन्द्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही है जो साम्प्रदायिक दंगे-फसादों को बाकायदा रणनीति बनाकर प्रायोजित करता है। अक्सर बुद्धिजीवियों, जनवादी राजनीतिक कार्यकर्ताओं सहित तमाम लोगों को यह भ्रम रहता है कि भारत में फ़ासीवाद का मतलब सत्ता में, खासकर केन्द्र में भाजपा की सरकार होने या ना होने से है। “लाल” झण्डे वाली संसदीय वाम पार्टियों ने इस धारणा को ओर बल दिया है जो अक्सर साम्प्रदायिक ताक़तों को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर कांग्रेस के आंगन में झाड़ू-पोंछा करती रहती हैं लेकिन वास्तव में हक़ीक़त ऐसी बिलकुल भी नहीं है। भाजपा भारतीय फ़ासीवादी धारा का सिर्फ एक राजनीतिक संगठन है जिसका इस्तेमाल संघ संसदीय स्पेस को ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए करता है। संघ के 30 से ज़्यादा और संगठन भी हैं। इसलिए अगर भाजपा सत्ता में नहीं हो तो इसका मतलब यह नहीं है कि फ़ासीवाद का ख़तरा टला हुआ है और फ़ासीवाद का मुकाबला करने का मतलब महज भाजपा को केन्द्र में सरकार बनाने से रोकना है। इसके उलट ऐसे समय में फ़ासीवाद अपना काम चुप-चाप लेकिन उतने ही सघन और पूरी ताक़त से कर रहा होता है जितना वह सत्ता में रहने के दौरान करता है। संघ की सरगर्मियों और पिछले एक दशक के दौरान, जब इसकी संसदीय ‘शाखा’ यानी भाजपा केन्द्रीय सत्ता से बाहर है, इसके कारनामों को देखकर इस बात का अन्दाज़ा भली-भाँति हो जाता है।

यहाँ हम यह स्पष्ट कर दें कि संघी साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद को बेनकाब करने और उसका विरोध करने का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि हम दूसरे धर्मों की साम्प्रदायिक धाराओं और फ़ासीवादी रंगतों को किसी भी तरह की छूट दे रहे हैं, या किसी को उनकी निन्दा और विरोध नहीं करना चाहिए। मुस्लिम कट्टरपन्थी सहित हर तरह के साम्प्रदायिक संगठनों और फ़ासीवादी रंगतों को भी आवाम के सामने और ख़ास तौर पर उन धर्मों, इलाकों के लोगों के बीच बेनक़ाब करना उतना ही ज़रूरी है। पर हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत में सरेआम फ़ासीवादी सत्ता कायम करना, दूसरे धर्मों, जाति या इलाका आधारित अल्पसंख्यक लोगों को दबाने, क़त्लेआम करने और बड़े पूँजीपतियों के लिए संकट के दौर में डण्डे का राज क़ायम करने, हर तरह के जन विरोध को कुचलने का सामर्थ्य और सम्भावना सिर्फ संघी फ़ासीवाद में ही है। भारतीय पूँजीपति वर्ग भी “कठिन समय” में अपना दारोमदार संघी फ़ासीवाद के ऊपर ही डालेगा। भारतीय पूँजीपतियों जैसे टाटा, अम्बानी आदि द्वारा गुजरात के “विकास पुरुष” नरेंद्र मोदी की समय-समय पर की जा रही खुले दिल से तारीफ़ और भाजपा द्वारा मोदी को 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए आगे लाना आने वाले कल की झलक पेश कर रहा है। अन्तरराष्ट्रीय पूँजीवाद की भोंपू ‘टाइम’ पत्रिका तो बहुत पहले ही अपने पहले पन्ने पर मोदी की फोटो लगाकर उनके द्वारा गुजरात के “विकास” के कसीदे पढ़ चुकी है और उन्हें भारत के भविष्य के नेता के रूप में पेश कर चुकी है। दूसरी तरफ, अल्पसंख्यक साम्प्रदायिक धाराओं या फ़ासीवादी रंगतों में ऐसी सम्भावना या सामर्थ्य बिलकुल भी नहीं है, लेकिन चूँकि ये धाराएं और रंगतें जनवादी ताक़तों के फ़ासीवादी विरोधी कैम्‍प की एकता को तोड़ने, बिखेरने और संघी फ़ासीवाद के प्रचार के लिए मसाला उपलब्ध करवाने के सिवा और कुछ नहीं करतीं, इसलिए इनका पर्दाफाश भी उतना ही ज़रूरी है। पर यह याद रखना चाहिए कि इनमें से ज़्यादातर ताक़तें अपनी खुराक संघी-मार्का हिन्दू फ़ासीवाद के विरोध में और अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना से ही प्राप्त करती हैं।

2014 के चुनाव आ रहे हैं, और संघ के फ़ासीवादी गिरोह धर्म के नाम पर जनता का ध्रुवीकरण करने के लिए पूरे ज़ोर-शोर से लगे हुए हैं। दंगे-फसाद कराने के अलावा संघ के फ़ासीवादी गिरोह और भी बहुत कुछ करते हैं जिन पर अक्सर ही आम लोगों की नज़र नहीं पड़ती। इन सब के बारे में चर्चा करने से पहले हम संघी संगठनों (जिनको ‘संघ परिवार’ कहा जाता है) के कारनामों पर एक नज़र डाल लें जिनमें मुसलमानों और ईसाईयों के विरुद्ध हिंसा शामिल हैं ।


संघी फ़ासीवाद की करतूतों पर एक नज़र - 

अपने जन्म से लेकर ही, संघ की तरफ से फैलाया गया साम्प्रदायिक ज़हर कितना ख़तरनाक और व्यापक रूप धारण कर चुका है, इसका पता गुजरात और महाराष्ट्र में हुई साम्प्रदायिक घटनाओं और दंगों से चलता है। हालांकि काँग्रेस (जिसकी 1984 के सिख विरोधी दंगों में भूमिका जगजाहिर है) और महाराष्ट्र में शिवसेना और एन.सी.पी. आदि भी साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने में शामिल रही हैं लेकिन फ़ासीवादी कार्यक्रम संघ के पास ही है, यह इसकी बाकायदा रणनीति है। अकेले महाराष्ट्र में 1998-2008 के 11 साल के दौरान 1123 साम्प्रदायिक झड़पें या दंगे हुए, जिनमें तकरीबन 200 लोगों की जान गयी। अलग-अलग साल के हिसाब से देखा जाए तो यह पूरे देश में होने वाली इस तरह की घटनाओं का 10.23 प्रतिशत है। यह संख्या गुजरात से भी ज़्यादा है जहाँ 2002 के दंगों में 2000 से ज़्यादा लोग मारे गये। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में देश के बाकी सभी शहरों से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे या झड़पें हुई हैं। जलगाँव, धूले, ठाणे, परभणी, नांदेड़, शोलापुर आदि शायद ही कोई शहर हो इस प्रांत में जहाँ साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए। हाल यह हो चुका है कि महाराष्ट्र में अब औसतन हर बीस दिन में साम्प्रदायिक दंगों जैसी घटना होती है।

गुजरात में इसी दौरान 823 साम्प्रदायिक दंगों की घटनाएँ हुई जिनमें 1114 मौतें (सरकारी सूचनाओं पर आधारित) हुई हैं। अन्य रिपोर्टों के अनुसार अकेले 2002 के गुजरात दंगों में ही 2000 मौतों का अनुमान है। उत्तर प्रदेश भी पीछे नहीं है, यहाँ पर भी 2001-11 के अन्तराल में 1112 साम्प्रदायिक झड़पें या दंगे हुए जिनमें 284 मौतें हुई। इसके बाद नम्बर आता है मध्य-प्रदेश का जहाँ 2000-08 के बीच 801 साम्प्रदायिक वारदातें हुई और 115 मौतें। अगर 2005-09 का अन्तराल लें तो यह प्रदेश दूसरे स्थान पर आता है जब यहाँ 648 घटनाएं हुईं। एक बात और, अक्सर दंगों को हिन्दू-मुस्लिम दंगे या साम्प्रदायिक झड़पों का नाम दिया जाता है लेकिन मरने वालों की बड़ी संख्या मुसलमानों की रहती है। गुजरात दंगों में मरने वालों में भी, सरकारी सूचनाओं के अनुसार, 75 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम थे, जबकि गैर-सरकारी सूचनाओं के अनुसार यह आँकड़ा 90 प्रतिशत से ज्यादा का है। तथ्य बताते हैं कि आम तौर पर ये हिन्दू-मुस्लिम दंगे या झड़पें उकसाई जाती हैं या फिर मुसलमानों पर योजनाबद्ध हमले और कत्लेआम होते हैं।

इसके अलावा उड़ीसा में 2007-08 में ईसाई विरोधी दंगे हुए जिनमें संघ परिवार के संगठन विश्व हिन्दू परिषद ने मुख्य भूमिका निभाई। सबसे भयंकर दंगे कन्धमाल जिले में हुए। यहाँ 210 गांवों के 4600 घर जला दिए गए, 40 मौतें हुई, 18000 लोग जख्मी हुए, 50,000 को अपनी जगह से उजड़ना पड़ा और 252 चर्च तथा 13 शिक्षा संस्‍थान आग के सुपुर्द कर दिए गए। पता नहीं कितने बलात्कार हुए और बहुत से यतीमखाने जलाने की घटनाएं हुईं। उल्लेखनीय है कि इन दंगों के समय भाजपा, बीजू जनता दल के साथ राज्य की गठजोड़ सरकार का हिस्सा थी। भाजपा का एक विधायक इन दंगों को भड़काने में शामिल था। शर्मनाक बात यह है कि मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भाजपा और संघ के दूसरे फ़ासीवादी संगठनों की इन दंगों में भूमिका पर आलोचना का एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाला। जब चुनाव नजदीक आए तो पटनायक ने भाजपा से समझौता तोड़ कर दंगों के कारण ‘प्रदेश की हुई राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी’ और ‘संघ की घटिया भूमिका’ का राग अलापना शुरू कर दिया।

इसी तरह कर्नाटक में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की वारदातें लगातार हो रही हैं जिसके पीछे संघ और इससे जुड़े संगठनों का ही हाथ है। इस प्रदेश ने 2009 में मैसूर में मुस्लिम विरोधी वारदातें, और 2008 में मंगलोर, उडपी, शिमोगा आदि शहरों में चर्च और पादरियों पर लगातार हुए हमले देखे हैं। इस प्रदेश में भी संघ पिछले चालीस साल से सक्रिय है, बेशक इसका परिणाम अभी मुंबई 1992 या गुजरात 2002 जैसा दिखाई नहीं दिया पर इसकी पूरी संभावना है। इसके लिए पूरी कोशिश संघ और इससे जुड़े फ़ासीवादी गिरोह लगातार कर रहे हैं। ऐसी ही कोशिश ‘श्रीराम सेने’ नाम के हिन्दू फ़ासीवादी गिरोह ने 1 जनवरी, 2012 को सिंधागी नाम के कस्बे में की। श्रीराम सेने के कारकुनों ने तहसीलदार दफ़्तर पर आधी रात को पाकिस्तान का झंडा लगा दिया और इसका इल्‍जाम स्थानीय मुसलमान आबादी के सिर मढ़ दिया और इलाके में मुसलमान विरोधी प्रचार शुरू कर माहौल को साम्प्रदायिक बनाने की कोशिशें की। छह दिन बाद जब इस गिरोह के छह लोग दबोचे गए तो सभी हिन्दू फ़ासीवादी संगठनों ने उनके बचाव के लिए चीखना शुरू कर दिया। यह भी सामने आया कि इन्हीं छह लोगों ने घटना के अगले दिन ‘दोषियों को पकड़ने’ में देरी के विरोध में रोष प्रदर्शन आयोजित किये थे।

संघ का प्रसार उसके परंपरागत खेमों से बाहर होने के संकेत भी आने शुरू हो गए हैं। राजस्थान में संघ ने पैर पसारे हैं। उदयपुर तथा जोधपुर के नजदीक एक गांव बालेसिर में साम्प्रदायिक वारदातें हो चुकी हैं। सन 2011 में भरतपुर जिले में हुए गोपालगंज हत्याकांड ने संघ के द्वारा इस राज्य में बुने जाल को सामने ला दिया है। पहले तो प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने इस घटना पर पर्दा डालने की कोशिश की, मगर बाद में जब जांच रिपोर्टों ने इस हत्याकांड में संघ से जुड़े स्थानीय गुर्जर भूमिपतियों की भूमिका, सरकारी मशीनरी तथा पुलिस के साथ इसके संबंधों को नंगा किया तो दिखावे के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले शुरू कर दिए गए। गोपालगंज में एक कब्रिस्तान की जमीन का विवाद है जिसके बारे में कई बार अदालती फैसला मुस्लिम समुदाय के हक में हो चुका है मगर गुर्जर भूमिपति इस फैसले को मानने से इनकार करते हैं। 14 सितंबर 2011 को जब इस संबंध में दोनों पक्षों में बातचीत हो रही थी तो संघ, विहिप, बजरंग दल और गुर्जर भूमिपतियों के गुंडों ने मुस्लिम मुहल्लों में छीना-झपटी, और आगजनी शुरू कर दी। दोपहर के समय जब इलाके के लोग मस्जिद में नमाज के लिए इकठ्ठे हुए तो उन लोगों ने पुलिस के साथ मिलकर मस्जिद से बाहर निकलने वाले रास्तों पर पुलिस के वाहन खड़े कर हमला बोल दिया। लाठियों और गोलीयों से हुए इस हमले में 20 लोग मारे गए। गोलियों के निशान मिटाने के लिए मरे हुए लोगों की टांगें और बाजू काट दिए गए और लाशों के साथ कुछ लोगों को जिंदा जला दिया गया। उत्तराखंड में भी तराई का इलाका जो बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने के बाद भी शांत रहा था, अब साम्प्रदायिक दंगों की लपेट में आ चुका है। 2011 में शहीद अशफाकउल्ला का बुत तोड़ने पर रुद्रपुर शहर में दंगे भड़क उठे।

दंगों के लिए माहौल बनाना और फिर उसको अंजाम देना, सिर्फ यही नहीं है जो संघी फ़ासीवाद करता है। दुनिया भर के हर फ़ासीवादी की तरह, यह भी अपने खिलाफ बोलने वाले कलाकारों, बुद्धिजीवियों और लेखकों के ऊपर हमले, धमकियाँ और यहाँ तक की कत्ल की वारदातों को भी अंजाम देता है। मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गुंडों द्वारा प्रो. सभरवाल का कत्ल, नामी चित्रकार एम. एफ. हुसैन पर लगातार हमले, कश्मीर मसले पर होने वाले सेमिनारों आदि में लगातार गुंडागर्दी और इस मसले पर संघ के विरूद्ध बोलने वालों पर हमले जिनमें पिछले साल वकील शांति भूषण पर हुआ हमला, इसके कुछ उदाहरण हैं। शिक्षा संस्थानों का भगवाकरण और भारत के इतिहास और संस्कृति की ‘संघी कहानी’ के खिलाफ जाने वाली किताबों को पाठ्यक्रम से बाहर करवाना, जलाना जैसी घटनाएँ अक्सर होती रहती हैं। रोहिंटन मिस्त्री के नावेल को मुंबई युनीवर्सिटी के पाठ्यक्रम से और रामानुजन के रामायण के बारे में लिखे लेख को दिल्ली युनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम से हटाने का मसला इसका उदाहरण है। 1970 के दशक में भी इसी तरह संघी दबाव के कारण जनता पार्टी सरकार ने इतिहासकार रामशरण शर्मा की किताब “एंशिएंट इंडिया” को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया था।

इसके अलावा पिछले दशक में संघ की आतंकवादी हरकतों में भी इज़ाफ़ा हुआ है। महात्मा गाँधी के क़त्ल को छोड़ कर आजादी के बाद संघ ने इस क्षेत्र में ज्यादा कुछ नहीं किया था। पर बीते कुछ सालों में कई ‘रहस्यमयी’ धमाकों के पेंच जब खुलने लगे तो संघ का आतंकवादी नेटवर्क और हथियारबंद संगठनों का तानाबाना सामने आया। 2003 और 2004 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके के तीन शहरों जालना, पूर्णा और परभणी में मस्जिदों में बम धमाके हुए और परभणी की एक मस्जिद के बाहर मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने नमाज के लिए आए लोगों पर अंधाधुन्ध गोलीबारी की।

परभणी में हुई इस वारदात के बाद तो पूरे मराठवाड़ा में हिंसा फैल गयी थी। ये धमाके ‘रहस्यमयी’ बने रहे। फिर 2006 में मराठवाड़ा इलाके के एक और शहर नांदेड़ के एक घर में धमाका हुआ और अगले साल इसी शहर की एक बेकरी में धमाका हुआ। इसके बाद 18 फरवरी, 2007 को समझौता एक्सप्रेस बम धमाका हुआ जिसमें 68 लोगों की मौत हो गयी और 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में मस्जिद के आगे धमाका हुआ। जब नांदेड़ धमाके की तफ़्तीश हुई तो पता चला कि धमाके वाला घर संघ से जुड़े एक व्यक्ति का है और मारे गए दोनों लोग बजरंग दल के कार्यकर्ता थे। जख्मी हुए चार व्यक्ति भी संघ के ही सदस्य थे। बेकरी धमाके में मारे गए दो आदमी भी बजरंग दल के सदस्य निकले। असल में इन दोनों जगहों पर संघी टोले बम बना रहे थे जिनका प्रयोग नांदेड़ शहर में मुसलमानों पर हमले के लिए और दंगा भड़काने के लिए होना था। इसी टोली ने जालना, पूर्णा और परभणी में बम धमाके किये थे। इसी तरह जब पोल खुलनी शुरू हुई तो मालेगांव धमाके और समझौता एक्सप्रेस में धमाकों के पीछे भी संघी फ़ासीवाद का हाथ सामने आया। संत असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और फौज के लेफ़्टीनेंट कर्नल पुरोहित तक इसके तार जा जुड़े। सब कुछ सामने आने पर संघ, इसके अन्य फ़ासीवादी गिरोहों और इसके संसदीय मुखौटे भाजपा ने खूब हल्ला मचाया, इससे मुकरने की कोशिश भी की और पकड़े गए संघी कारकुनों को बेकसूर एवं देशभक्त बताना शुरू कर दिया।

आम लोगों के खिलाफ फ़ासीवादी जंग जारी रहती है, 
बस तरीके बदलते हैं - 

भाजपा और संघ के तीन मुख्य मुद्दे हैं – राममंदिर, संविधान की धारा 370 को खत्म करना और देश में एक जैसा नागरिक कोड लागू करना। 2004 के लोकसभा चुनावों में ये तीनों मुद्दे फुस्स होने के कारण संघ ने इनको कुछ समय के लिए पीछे धकेला और लामबंदी के दूसरे सामाजिक और सांस्कृतिक रंगत वाले तौर तरीके आजमाने शुरू किए। इनमें पहला काम जो संघ कर रहा है वह है गौ रक्षा के लिए कानून बनाने की मुहिम चलाना और इस मसले पर हिन्दू और मुसलमानों तथा अन्य धर्मों को मानने वालों के बीच ध्रुवीकरण को तीखा करना। दूसरा क्षेत्र जहाँ संघ पूरे जोर से काम कर रहा है वह है शिक्षा को साम्प्रदायिक रंग देना। जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं वहाँ तो ये काम सरकारें कर ही रही हैं। तीसरा काम लोगों के ज्वलंत मुद्दों को ढाल बनाकर अपना आधार बनाना और भ्रष्टाचार विरोधी ‘अन्ना मुहिम’ को समर्थन देना। आडवाणी की भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘रथ यात्रा’ इसी योजना का हिस्सा थी।

1925 में अपनी स्थापना के बाद से ही, संघ ने ‘गौ रक्षा समितियों’ का एक व्यापक नेटवर्क खड़ा किया है, खास तौर पर उत्तर भारत में। इनका काम कहने को तो गौशाला चलाने का है पर अपने जन्‍म से ही ये समितियाँ दंगे भड़काने और साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने में शामिल रही हैं। “गौ हिंदुओं के लिए पवित्र है”, “मुसलमान हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए गोमांस खाते हैं।” इस तरह की बेसिरपैर, बेबुनियाद बातों को दोहराना इन समितियों का मुख्य काम रहा है। मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान के राज्य में इसको ही “पवित्र गौ” और भोपाल की मस्जिदें, ताज-उल मस्जिद और और जामा मस्जिद के बीच मुकाबला बनाकर पेश किया जाता रहा है। 1950 से ही गौ रक्षा का मुद्दा भाजपा के मुख्य एजेण्डे पर रहा है, तब इसका नाम जनसंघ था। बेशक भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने आजकल कट्टर हिन्दुवादी मुखौटे को उतारकर नरम हिन्दुवादी मुखौटा पहना हुआ है लेकिन प्रादेशिक स्तर पर हिन्दू फ़ासीवादी मुखौटा पूरी कुशलता के साथ अपना काम किये जा रहा है। इसको ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने गौ रक्षा के लिए कानून को और भी सख्त बनाने के लिए बिल पास किया जिसके तहत अब गौ हत्या पर सात साल की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। ना सिर्फ इतना ही, गोमांस खाना भी पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। गिरफ़्तारी के अधिकार हैड कांस्टेबल रैंक के पुलिस कर्मी को दे दिए गए हैं, यहाँ तक कि गोमांस खाने के शक के आधार पर ही किसी को भी गिरफ़्तार किया जा सकता है। इस कानून को पास करने से पहले विश्व हिन्दू परिषद ने पूरे मध्यप्रदेश में हस्ताक्षर अभियान चलाया। प्रदेश की शिवराज चौहान सरकार ने भारी धनराशि सरकारी तौर पर गोशालाओं को बनाने के लिए जारी की। याद रहे मध्यप्रदेश पूरी दुनिया में भयंकर गरीबी और भुखमरी से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शुमार है। भाजपा सरकार वाले अन्य प्रदेशों जैसे गुजरात, कर्नाटक, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में भी ऐसे ही कानून बनाए गए हैं।

शिक्षा का भगवाकरण भी उच्च स्तर पर जारी है । जब भी भाजपा सत्ता में आई, उन राज्यों में पाठ्य-पुस्तकों को बदलने का काम शुरू हो गया। केन्द्र में सरकार रहने के समय भी भाजपा के मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने प्राइमरी, सेकेंडरी और उच्च स्तर पर पाठ्यक्रम को ज्यादा भारतीय, ज्यादा कौमी और ज्यादा आध्यात्मिक बनाने की कोशिशें कीं लेकिन इसमें उनको सफलता नहीं मिली। लेकिन भाजपा की प्रादेशिक सरकारें इसमें कोई ढील नहीं दे रही हैं।

गुजरात में नौवीं कक्षा को पढ़ाया जाता है कि “देश के लिए सबसे बड़ी मुसीबत अल्पसंख्यक समुदाय है”। इसके बाद “अनुसूचित जातियाँ और कबीले, स्मगलिंग, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी” आते हैं। इस पाठ के अनुसार मुसलमान और पारसी विदेशी हैं। सेकेंडरी लेवल पर नरेंद्र मोदी की जीवनी पढ़ाने की सिफारिश की जाती है। मध्य प्रदेश और कर्नाटक की भाजपाई सरकारों ने स्कूलों में गीता की पढ़ाई अनिवार्य करने की कोशिश की, जो फिलहाल विरोध के कारण खटाई में पड़ गयी है। उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार ने नया क्षेत्र खोजा है – यहाँ पर आज-कल संस्कृत को उच्च महत्व देने का काम जारी है।

सरकारों का इस्तेमाल शिक्षा ढाँचें के भगवाकरण में करने के अलावा, शिक्षा क्षेत्र में संघ की एक बड़ी मशीनरी ‘विद्या भारती’ काम करती है। ‘विद्या भारती’ की स्थापना 1977 में की गयी। अब पूरे भारत में इसके 28000 स्कूल चलते हैं। इनमें 32,50,000 विद्यार्थी पढ़ते है। इन स्कूलों के लिए पाठ्य पुस्तकें ‘विद्या भारती संस्थान’ छपवाता है जिनको 1996 में ही राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद (एन.सी.ई.आर.टी.) ‘धार्मिक कट्टरपंथ और संकीर्णता’ को बढ़ावा देने वाली किताबें कह चुकी है। भारत के इतिहास के सबंध में तरह-तरह के मनगढ़ंत झूठ विद्यार्थियों को पढ़ाए जाते हैं जैसे – 1528-1914 ईस्वी के अंतराल में राम जन्मभूमि पर 77 हमले हुए और 3-5 लाख श्रद्धालुओं ने पवित्र स्थान की रक्षा के लिए जान दे दी। 2 नवंबर 1990 का दिन भारत के इतिहास का ‘काला दिन’ है क्योंकि उस दिन हिंदुओं को बाबरी मस्जिद तोड़ने से रोक दिया गया था, इत्यादि। इसके अलावा संघ अशिक्षा खत्म करने के नाम पर ‘एकल विद्यालय’ अर्थात एक अध्यापक वाले स्कूल चलाता है। यहाँ संघी फ़ासीवादी विचारधारा का प्रचार खुलेआम किया जाता है। संघ के इस शिक्षा ढाँचे को फंड दिलाने के लिए पश्चिमी देशों में संघ के संगठनों की शाखाएं हैं जो सीधे अपने नाम या ‘इंडिया डेवेलपमेंट एंड रिलीफ फंड’ जैसे ग्रुपों के नाम से लाखों डालर जुटाती हैं। मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़, और झारखण्ड आदि प्रदेशों में ‘एकल विद्यालयों’ को सरकार अनुदान देती है जबकि इसका नियंत्रण संघ के हाथों में है।

विश्व हिन्दू परिषद पूरे भारत में ‘शुद्धि मेले’ आयोजित करता है जहाँ लोगों को हिन्दू धर्म धारण करवाया जाता है या दूसरा धर्म धारण कर चुके लोगों को ‘वापस’ बुलाया जाता है। भाजपा सरकार वाले प्रदेशों में तरह-तरह के धार्मिक आज़ादी के कानून लाये जा रहे हैं जो भारत में नागरिकों के किसी भी धर्म को मानने और प्रचार करने के बुनियादी संवैधानिक हक के ही खिलाफ हैं। तरह-तरह के तरीकों से अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोगों को अलग-अलग इलाकों में रहने के लिए मजबूर किया जाता है । जैसे अहमदाबाद में मुसलमान शहर के कुछ खास इलाकों में केंद्रित हो गए जो नाजी जर्मनी में यहूदियों के इलाके ‘घेट्टो’ की याद ताजा कर देते हैं। दूसरी ओर, ‘सेवा भारती’ जैसे संघी संस्थान हैं जो ‘समाज कल्याण’ के मुखौटे तले फ़ासीवादी प्रचार को आगे बढ़ाते हैं। ऐसा ही ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ है जो आदिवासियों में ‘समाज कल्याण’ का काम करती है। कुल मिलाकर संघ के 30 से अधिक अलग-अलग संगठन हैं जो देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तबकों और धर्मों के बीच काम करते हैं।

इसके अलावा संघ नागपुर में ‘भोंसला मिलेट्री स्कूल’ चलाता है जिसका कई बम धमाकों में नाम आ चुका है। 2012 के फरवरी महीने में संघ ने इस स्कूल के 75 साल पूरे होने पर जश्न मनाया जिसके मुख्य भाषण के दौरान संघ के मोहन भागवत ने ब्रिटिश राज्य को आज के भारत से अच्छा बताकर संघ की ब्रिटेन भक्ति का सबूत दिया और साथ ही कहा की ‘विद्यार्थियों’ को आम शिक्षा के साथ मिलेट्री ट्रेनिंग देना ज़रूरी है क्योंकि ‘देश को ख़तरा’ है। याद रहे कि इस स्कूल की स्थापना 1937 में संघ के सदस्य और हिन्दू महासभा के नेता डॉ. मुंजे ने की थी, इसकी नींव का पत्थर उस समय के बम्बई प्रदेश के अंग्रेज गवर्नर सिर रोजर लुमले ने रखा था। इस स्‍कूल को डॉ. मुंजे द्वारा ही स्थापित केन्द्रीय हिन्दू मिलेट्री शिक्षा कमेटी चलाती है। 65 एकड़ में फैले इस स्कूल के कैम्पस को ‘रामभूमि’ कहा जाता है और आम शिक्षा के साथ-साथ ‘पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट कोर्स’, मिलेट्री ड्रिल्स, गोली चलाने और हथियारों की शिक्षा दी जाती है। यहाँ तक कि तोपखाने चलाने का प्रदर्शन भी किया जाता है। इस स्कूल के पढ़े हुए कई ‘विद्यार्थी’ भारतीय फौज के ऊंचे ओहदों पर पहुंचे हैं। 75 साला जश्न के मौके पर यह ऐलान किया गया कि मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तराखण्ड में ऐसे और स्कूल खोले जाएंगे।

नांदेड़ धमाकों की तफ़्तीश में सामने आया कि उस टोली का रिंग-लीडर हिमांशु पांसे और उसका साथी केशव वाघ इसी मिलेट्री स्कूल में 15 दिनों का कैम्प करके गए थे और पुणे में इन्होंने पाइप-बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था। पुणे के एक सेवामुक्त नौसेना अफसर एस. आर. भाटे का नाम भी इसी जाँच के दौरान सामने आया जो कि 1996 से संघ के साथ जुडा हुआ है। उसने माना कि उसको एक स्थानीय बजरंग दल नेता ने अपने कारकुनों को ‘जिलेटीन स्टिक’ का प्रयोग सिखाने के लिए कहा था। इसके लिए पहले उसने एक स्थानीय कैंप लगाया। मालेगांव धमाके के तार भी इसी स्कूल से जुड़ते हैं। और ऐसा ही फ़ासीवादी संगठन ‘अभिनव भारत’ के मामले में सामने आया है। लेफ़्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित के मालेगांव धमाकों के ‘मास्टरमाइंड’ होने के तथ्य सामने आने के अलावा यह भी राज खुला कि इस स्कूल के प्रिंसिपल कर्नल एस.एस. रायकर और एक क्लर्क भी इस मामले से और ‘अभिनव भारत’ के साथ जुड़े हुए हैं। अखबारों में इस बात का खुलासा होने के बाद इन्होंने बिना कोई कारण बताए इस्तीफा दे दिया। जब्त हुई ऑडियो टेपों में श्रीकांत पुरोहित यह कहता है – “स्कूलों के साथ संघ का नाम नहीं आना चाहिए और अलग से ‘बसटियन गार्ड’ के नाम से काम किया जाए।” सच के पूरी तरह सामने आ जाने के बावजूद न तो इन दक्षिणपंथी फ़ासीवादी संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है और न ही संघ के मिलेट्री स्कूल के खिलाफ, बेशक देश भर में जनहित में काम करने वाले कार्यकर्ता लगातार मिलेट्री प्रशिक्षण के इन स्कूलों को बंद करवाने के लिए आवाज उठा रहे हैं।

साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद महज वोट बटोरने वाली राजनीति नहीं, पूँजीवादी ढाँचे में इसकी भूमिका कहीं बड़ी और ख़तरनाक होती है

अक्सर साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद को इन अर्थों में लिया जाता है-

इस साल

दंगा बहुत बड़ा था

ख़ूब हुई खून की बारिश

अगले साल अच्छी होगी

फसल मतदान की—

यह बात अपने आप में सही है, मगर यहीं तक रुक जाना साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद की जोड़ी की भूमिका को बहुत छोटा कर देखना होगा। इसकी भूमिका पूँजीवादी ढांचे के अंदर कहीं बड़ी है। फ़ासीवाद पूँजीवादी ढांचे के अंदर ‘खूंटे से बंधे कुत्ते’ की तरह होता है जिसकी जंजीर पूँजीपति वर्ग के हाथों में रहती है। पूँजीवादी ढांचे के अंदर इसकी मौजूदगी लगातार बनी रहती है। जैसे ही पूँजीपति वर्ग के लिए सत्ता के दूसरे रूपों जैसे संसदीय जनवाद के द्वारा लोगों पर अपना नियंत्रण रखना और पूँजीवादी लूट को जारी रखना असंभव हो जाता है उसी समय फ़ासीवाद का क्रूर खंजर वक्त के अँधेरे कोनों से निकल के सामाजिक रंगमंच पर आ प्रकट होता है और अपने आकाओं, वित्तीय पूँजी की सेवा में मेहनतकश लोगों पर टूट पड़ता है।

पूँजीवाद के विकास के साथ सामाजिक दौलत कुछ हाथों में केंद्रित होती जाती है और मजदूरों, किसानों और निम्न-मध्यवर्ग की बड़ी आबादी की हालत बद से बदतर होती चली जाती है। फिर जैसे ही पूँजीवाद के ‘बूम’ का समय (जो आजकल पूँजीवादी ढांचे के लिए बीती बात हो गयी है, अब तो मंदी से थोड़ी राहत को ‘अच्छा वक्त आ गया है’ कहकर बुर्जुआजी खुद को सान्त्वना दे लेती है) खत्म होता है, मजदूरों, किसानों और निम्न-मध्यवर्ग की हालत और तेजी से खराब होती है। परिणामस्वरूप एक तरफ जहाँ मजदूरों की बड़े पैमाने पर छंटनी होती है और उनमें बेरोजगारी तथा भुखमरी फैलती है, वहीं मध्यवर्ग को भी अपना अंत समय नजदीक दिखाई देने लगता है। उसके छोटे मोटे कारोबार बंद होने, नौकरी जाने और महंगाई के बढ़ने के कारण उसके लिए भयंकर तबाही आती है और यह वर्ग छटपटाता है। लोगों के भीतर सामाजिक ढांचे के खिलाफ गुस्सा, बेचैनी और बगावत की भावना फैलने लगती है। ऐसे समय में अगर लोगों को सही अगुवाई मिलती है तो क्रान्ति की संभावना भी पैदा होती है। यही वह समय होता है जब राज्य करने वाले वर्ग के लिए परम्परागत तरीकों से लोगों पर हुकूमत करना संभव नहीं रहता और उसके पास फ़ासीवाद के पैरों में गिरने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता क्योंकि जहाँ एक तरफ फ़ासीवाद वित्तीय पूँजी का पक्का सेवक होता है, वहीं उसका समाज के अलग-अलग तबकों में व्यापक आधार भी होता है, खास तौर पर मध्यवर्ग और किसानों में और कुछ हद तक मजदूरों में भी। फ़ासीवाद एक लहर की तरह आगे बढ़ता है। फ़ासीवाद पूँजीवादी लूट और इसकी मुनाफे की अंधी हवस से जन्मे हुए संकट के कारण पैदा हुई बेरोजगारी, और भुखमरी के लिए समाज के किसी एक तबके को, जो आम तौर पर नस्ली या धार्मिक अल्पसंख्यक होता है, को समस्याओं का असली कारण बनाकर पेश करता है, लोगों में इनके खिलाफ पूरी ताक़त से हमला करने के लिए प्रचार करता है और उदाहरण पेश करने के लिए कुछ वारदातों को अंजाम देता है। ये लोगों को संकट से राहत के लिए चमत्कारी तरीके सुझाता है जिसमें लोगों को बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती और ऐसे ही तरीके मध्यवर्ग और किसानों को सब से ज्यादा भाते हैं। देश के पुराने समय की महानता का , खास धर्म, नस्ल या जाति के संसार के सर्वोत्तम मनुष्य होने का, पड़ोसी मुल्कों से देश की सुरक्षा को ख़तरे का, युद्ध का गुणगान, देश भक्ति का तीखा और लगातार तेज प्रचार फ़ासीवाद का मुख्य हथियार होता है। फ़ासीवाद के रावण की तरह दस सिर होते हैं और लोगों को अपने असली एजेंडे के बारे में कुछ भी समझ न आने देने के लिए हर मुंह से अलग-अलग राग अलापना उसका आम तरीका होता है। विरोधियों को अपने भाड़े के गुंडों द्वारा ठिकाने लगाना हर फ़ासीवादी पार्टी और उसके संगठनों के मुख्य लक्षणों में से एक है, अक्सर ऐसे हमले मध्यवर्गीय निराश, बेरोजगार नौजवानों को बहुत बहादुरी भरे कारनामे दिखाई देते हैं और वो फ़ासीवादी गुंडा गिरोहों के रंगरूट बनते हैं। फ़ासीवाद लगातार यह कूक-पुकार लगाता है ‘देखो काम तो हम करते हैं बाकी सब मीटिंगे करते हैं, बयान देते हैं और देश को, धर्म को नुकसान पहुँचाने की साजिशें करते हैं और दूसरे देशों के इशारों पर नाचते हैं’। फ़ासीवाद खुद को संकट से निजात दिलाने वाली एक ताक़त बनाकर पेश करता है और अपने हक में व्यापक जनमत बना लेता है जिसमें पूँजीपतियों के कब्जे वाला मीडिया, अखबार, टीवी, और अब इंटरनेट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे समय में अगर कोई लोकहित वाली राजनीतिक धारा मौजूद नहीं है, कमजोर है या भ्रष्ट होकर रास्ते से भटक चुकी है तो फासीवाद आसानी से लोगों को अपनी जकड में ले लेता है, और फिर शुरू होता है जुल्म और मौत का तांडव। सत्ता हासिल करने से पहले मुख्य निशाना अल्पसंख्यक समुदाय बनते हैं, और जैसे ही फ़ासीवादी सत्ता संभालते हैं अपने असली रूप में आ जाते हैं। अब इनके निशाने पर किसान और मध्यवर्ग समेत दबे-कुचले मेहनतकश तबके और पूँजीवादी लूट, दमन का विरोध करने वाली ट्रेड यूनियनें और राजनीतिक नेता, बुद्धिजीवी लेखक और कलाकार होते हैं। फ़ासीवाद वित्तीय पूँजी की सेवा करते हुए पूँजीवाद का विरोध करने वाली हर आवाज, हर साँस का गला दबाने के लिए गुंडा टोलियों, राज्य की फौज, पुलिस का इस्तेमाल करता है और देश का कोना-कोना इंसानी खून से रंग देता है। बेशक तब फ़ासीवाद का सामाजिक आधार बनने वाले मध्यवर्ग और दूसरे तबकों को असली खेल समझ में आता है लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी होती है, अब उनके पास खुद फ़ासीवादी कुत्तों की खुराक बनने या घरों में छुप कर पूजा-पाठ करने और दरवाज़े-खिड़कियों के सुराखों के बीच से गलियों में चलती कत्लो-गारत देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता।

फ़ासीवाद के उभार के ऐतिहासिक कारक - 

पूँजीवादी ढांचे का संकट फ़ासीवाद के उभार और उसके सत्ता में आने के लिए ज़रूरी शर्त तो है ही, पर कुछ ऐतिहासिक कारक हैं जो किसी खास देश में ऐसा होने में अहम भूमिका अदा करते हैं। पहला है, पूँजीवादी विकास और जमीन्दारी उन्मूलन किसी क्रान्ति का परिणाम न होकर एक ऊपर से थोपे गए क्रमबद्ध चरणों का परिणाम होता है जिसके कारण बुर्जुआजी द्वारा समाज के अंदर जनवादी मूल्य-मान्यताओं को फैलाते हुए सामन्ती मानसिकता और धर्म का दबदबा तोड़ने का जो ऐतिहासिक कार्य करना होता है वो नहीं हो पाता। इस कारण पूँजीवाद आपनी बीमारियाँ लेकर आता है। वही पुरानी सामन्ती बीमारियाँ समाज में बनी रहती हैं जिसके चलते फ़ासीवादी विचारों के तेजी से जड़ जमाने की जमीन तैयार होती है। दूसरा है, पूँजीवाद का तेज विकास जो समाज में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को बहुत तेज कर देता है, एक मध्यवर्ग जो किसी भी तरह की जनवादी चेतना से विहीन होता है, तेजी के साथ पैदा होता है और उसी तेजी के साथ बर्बाद होता है। किसानी में यही हाल होता है, छोटे और मध्यम किसान वर्ग किसी क्रान्ति के जरिए नहीं, बल्कि बुर्जुआजी के अपने हित में किये गए भूमि सुधारों के कारण कुछ जमीन के टुकड़े हासिल करते हैं पर पूँजीवाद का विकास उससे यह टुकड़ा छीन लेता है और उसको सड़क पर आने या मजदूरी करने के लिए मजबूर कर देता है। ऐसे में किसान अपने पुराने ‘सुनहरे युग’ कि कल्पना करता है, बेशक ऐसा युग कभी नहीं था। इतना ज़रूर था कि वो कभी सुखी, कभी दुखी रहकर अपने परिवार का पेट पाल लेता था। इसके साथ ऐसे देशों में सामन्ती भूमिपतियों या सामन्ती भूमिपतियों से पूँजीवादी भूमिपति बने बड़े जमींदारों का एक तबका समाज में मौजूद होता है जो हद दर्जे का पश्चगामी और जनवाद तथा क्रान्ति का विरोधी होता है। ये भूमिपति औद्योगिक तथा वित्तीय पूँजी के साथ अपने विरोधों के बावजूद फ़ासीवाद को वित्तीय मदद और गुंडों की टोलियाँ उपलब्ध करवाते हैं और बड़े पूँजीपति वर्ग के साथ ही फ़ासीवाद का जबरदस्त आधार बनते हैं।

तीसरा है, किसी भी क्रन्तिकारी ताक़त का मौजूद न होना या फिर कमजोर होना जो ऐसे समय में प्रचार-प्रोपेगंडा करते हुए संकट के असली कारणों और उसके निदान के बारे में लोगों के बीच जाती हैं, समाज के उन वर्गों को जो क्रान्ति की ताक़तें होती हैं लामबंद और संगठित करती हैं तथा ढुलमुल तबकों को प्रभावहीन करते हुए पूँजीवाद को पलटने के किये आगे बढ़ती हैं। चौथा है, संशोधनवादी पार्टियों की मेहनतकशों के साथ गद्दारी और लोगों को क्रान्ति के लिए तैयार करने की बजाय उनकी तनख्‍वाहों, उजरतों में चवन्नी-अट्ठन्नी की बढ़ोतरी करवाने की लड़ाई लड़ते रहना। इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया के जिस देश में फ़ासीवाद का उभार हुआ है और ये सत्ता पर काबिज हुआ है वहाँ के संशोधनवादियों की ऐसी नीतियों का फासीवादियों ने फायदा उठाया और उनको आम लोगों से अलग कर दिया, यहाँ तक कि उनको लोगों की नज़रों में देश का दुश्मन साबित कर दिया। यही सब कुछ भारत में भी हो रहा है। भारत के भाकपा, माकपा और लिबरेशन ब्रांड के “कम्युनिस्ट” यही कुछ कर रहे हैं। लोगों में काम के नाम पर ये सरकारी कर्मचारियों के लिए तनख्वाह कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाने, मजदूर इलाकों में फैक्ट्री मालिकों के लिए दलाली करने, हर साल-छमाही के बाद देश स्तरीय हड़ताल का ‘स्टेज-शो’ करने, साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर काँग्रेस तथा अन्य बुर्जुआ पार्टियों से मिलकर ‘साझा मोर्चा’ बनाने और कभी-कभी काँग्रेस से दूर होकर ‘तीसरा मोर्चा’ बनाने का नाटक करने और बुर्जुआ राजनीति की तरह घटिया संसदीय जोड़-तोड़ करके वोटों का जुगाड-पानी करने के सिवा कुछ नहीं करते। आम लोगों को शिक्षित करने, राजनीतिक चेतना देने और इस काम के लिए प्रचार करने का काम न तो इन्होंने किया है और न ही भविष्य में इसकी कोई संभावना है क्योंकि अब ये क्रान्ति से उतना ही दूर हैं जितना गंदे पानी में उगी हुई ‘जलकुंभी’ से खुशबू।

हमें समझ लेना चाहिए कि फ़ासीवाद का मुकाबला इंडिया गेट पर या शहर के किसी खास चौक पर दो चार मोमबत्तियाँ जलाकर, “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” जैसे उपदेशों से, साल-दो साल बाद सेमिनार, गोष्ठी, मुशायरा करके, तनख्वाहों-उजरतों में बढ़ोतरी की लड़ाईयाँ लड़कर नहीं होगा और न ही फ़ासीवादी दानव ‘इसको गुस्सा न करें’, ‘इसको मत ही छेड़ो’ जैसी बिल्ली को देख कर कबूतर के आँख बंद कर लेने जैसी डरपोक किस्म की सुरक्षात्मक हरकतों से पीछे हटने वाला है क्योंकि फ़ासीवादी गुंडे जब दस्तक देंगे तो वह नहीं सुनने वाले कि ‘हम ने तो कभी आप के विरुद्ध कुछ नहीं कहा’, हाँ वो ऐसी कायरता पे हँसेगे ज़रूर। फ़ासीवाद के मुकाबले के लिए इसके उभार के कारणों को समझते हुए लोगों में लगातार, घना और तीखा प्रचार करना होगा। फ़ासीवादियों के इतिहास और वर्तमान से संबंधित हर झूठ को नंगा करना होगा और साथ ही पूँजीवाद के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक ढांचे के तार-तार को उधेड़ कर लोगों के सामने इसे नंगा करना होगा। फ़ासीवाद के असल एजेंडे के बारे में लोगों का भ्रम तोड़ना होगा और उन्हें इसके बौद्धिक और सांस्कृतिक हमले का मुकाबला करने के लिए ज़रूरी ज्ञान और चेतना से लैस करना पड़ेगा। इस के लिए लगातार पर्चे, पैम्फ्लेट बाँटना, सेमिनार, गोष्ठियों, सभाओं का आयोजन करना, इतिहास और वर्तमान से संबंधित फ़ासीवादी झूठों को बेनकाब करते लेखों को लोगों की भाषा में उन तक पहुँचाना, नाटक, फिल्मों और गीत-संगीत के जरिए लोगों को फ़ासीवाद के कारनामों से रूबरू करवाना होगा। ऐसा समाज के हर तबके में जाकर करना होगा। लोगों की आर्थिक और राजनीतिक लड़ाई की अगुवाई और सुधार कामों से फ़ासीवादियों को बाहर करना होगा तथा लोगों को फ़ासीवाद के खिलाफ सड़कों पर होने वाली लड़ाई के लिए तैयार करना होगा। समाज के नौजवानों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों को इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को समझते हुए लोगों के बीच जाना, उन के साथ एक होने की हिम्मत करनी पड़ेगी। साथ ही यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि मजदूर वर्ग की शक्तिशाली एकता के बगैर फ़ासीवाद का प्रभावशाली तरीके से मुकाबला करना संभव नहीं है, इसलिए मजदूर वर्ग को सचेत करना तथा इसकी एकता कायम करना फ़ासीवाद के खिलाफ लड़ाई में फैसलाकुन भूमिका निभाएगा। अगर समाज को आगे ले जाने वाली ताक़तें सही समय तक अपनी ताक़त जुटा लेती हैं, सही रणनीति तैयार कर लेती हैं तो फ़ासीवाद के लिए आगे बढ़ना इतना आसान भी नहीं होगा और उसकी हार की संभावनाएं बढ़ जाएँगी, नहीं तो वही होगा जिसकी चेतावनी हिटलर के जमाने में जर्मनी के एक पादरी पास्टर निमोलर ने दी थी-

पहले वे यहूदियों के लिए आए

मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वे ट्रेडयूनियन वालों के लिए आए

मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था

फिर वे कम्युनिस्टों के लिए आए

मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नही था

फिर वे मेरे लिए आए

और तब तक कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिए बोलता…….

वे फिर आ रहे हैं। फ़ासीवादी सक्रिय हैं।


* फ़ासीवाद- एक राजनीतिक रुझान जो पूँजीवाद के व्यापक संकट के समय में पूँजीवादी देशों में उभरा और जिसने साम्राज्यवादी बुर्जुआजी की सब से पिछलग्‍गू और हमलावर शक्तियों के हित प्रकट किये। सत्ता में आया फ़ासीवाद इन ताक़तों की एक खुल्लमखुल्ला आतंकी तानाशाही होता है। फ़ासीवाद की विशेषता हद दर्जे का अन्धराष्ट्रवाद, नस्लवाद और कम्युनिज्म विरोध होता है। जनवाद की तबाही, सामाजिक दंभ का विशाल पैमाने पर प्रदर्शन और नागरिकों के जनतांत्रिक तथा निजी जीवन पर अत्यंत सख्त नियंत्रण होता है। फ़ासीवाद की विदेश नीति प्रसार और हमलावर जंगों की नीति होती है। पहली फ़ासीवादी हुकूमत 1922 में इटली में आई थी। फ़ासीवादी 1933 में जर्मनी में और 1939 में स्पेन में सत्ता में आए। हमारे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस रुझान का प्रतिनिधित्व करता है।

http://www.mazdoorbigul.net/Fascist-forces-are-playing-dangerous-game

Thursday, 7 November 2013

सवाल कलम का - गिरिजेश




प्रिय मित्र, शायद हमारा देश ही दुनिया का वह इकलौता देश है, जहाँ कलम-दवात की पूजा होती रही है और यहीं पर दुनिया में सबसे अधिक निरक्षर भी बसते रहे हैं. कलम की मार लाठी से बारीक़ होती है. पीढ़ियों से महीन लोग कलम की मार करते रहे हैं. बेबस मजलूमों पर कलम की बारीक मार करने वाले इन चालाक लोगों ने ही अधिकतम लोगों को पढ़ने-लिखने से रोकने की साज़िश भी इसी देश में हज़ारों वर्षों से सफलतापूर्वक रची है और अभी भी उनकी यह साज़िश जारी है. ऐसी हर पूजा और और उनमें संलग्न पुजारियों के आचरण के बारे में सोचने पर उनकी मक्कारी दिखने लगती है. और फिर उनसे केवल नफ़रत ही होती है.

कलम हथियार की तरह जब शोषक वर्गों के हाथ में होती है, तो उसे अत्याचार के लिये इस्तेमाल किया जाता है. जब वही कलम चाटुकार के हाथ में होती है, तो उसे चारण-कर्म के सहारे और पुरस्कृत होने के लिये इस्तेमाल किया जाता है. जब कलम पर न्यायकर्मी काबिज़ होता है, तो वह व्यवस्था के चाकर के रूप में न्याय की जगह निर्णय करने लगता है. कलम पर पकड़ रखने वाला शिक्षक नयी पीढ़ी में से कलम के फ़नकार गढ़ता है. 

मगर जब वही कलम धारदार तेवर के साथ हक़, इन्साफ और इन्सानियत की ख़िदमत में संकल्पबद्ध विद्रोहियों के हाथ में आती है, तो उससे चिनगारियाँ बिखरती हैं, अन्धकार थरथराता है और मानवता का प्रगतिपथ आलोकित होता है. यह पूरी तरह केवल और केवल कलमकार पर निर्भर है कि वह अपनी दक्षता का इस्तेमाल जन के हित में करता है या उसके विरोध में. 

मुझे कलम के सिपाही प्रेमचन्द की याद आ रही है.
मुझे कलम के फ़नकार गोर्की और रसूल हमज़ातोव की याद आ रही है.
मुझे निरक्षर कबीर और सुशिक्षित तुलसी की याद आ रही है.
मुझे मार्क्स और माओ की याद आ रही है.
मुझे गाँधी, अम्बेदकर और भगत सिंह की याद आ रही है.
मुझे मुक्तिबोध और राहुल सांकृत्यायन की याद आ रही है.
मुझे साहिर और फैज़ की याद आ रही है.
मुझे हावर्ड फ़ास्ट और लाल बहादुर वर्मा की याद आ रही है.

क्या मुझे यह उम्मीद करनी चाहिए कि आपकी कलम भी जन-स्वर को ध्वनित करने के लिये आजीवन प्रतिबद्ध रहेगी !
क्या आपकी कलम भी उनकी ही तरह एक के बाद एक हर बार एक और नया कमाल करती चली जायेगी !
क्या मुझे आपकी कलमकारी पर गर्व बना रह सकेगा !
उम्मीद है आप निराश नहीं करेंगे !
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश

"कर्बला में ऐसा क्या हुआ था कि इसकी याद सभी धर्म वाले मिल के मनाते हैं."

मुहर्रम पर विशेष : दैनिक जागरण से -



हर साल मुहर्रम का चाँद दिखाई देते ही ,हर तरफ कर्बला, या हुसैन की सदा सुनाई देने लगती है, लोगों की ज़बान पे पैगाम है इंसानियत,सब्र ए हुसैन (ए.स) और कुर्बानियों की कहानी फिर से सुनाई देने लगती है.

कल १० मुहर्रम आशूरा का रोज़ है जिस दिन इमाम हुसैन शहीद हुए थे. कल मुसलमान जो ग़म ए हुसैन मनाते हैं, शाम से ही घरों मैं चूल्हा नहीं जलाते, बिस्तर पे आराम से नहीं सोते, दिन मैं भी शाम के पहले खाना नहीं खाते और पानी नहीं पीते.दिन भर रोते हैं शोक सभाओं मैं बैठ के और्मतम करते हैं. या यह कह लें की ऐसे रहते हैं जैसे अभी आज ही किसी का इन्तेकाल हुआ है. यह इतिहास की ऐसी शोकपूर्ण घटना है कि जिसकी यादें १३७० वर्ष से सारी दुनिया में लोग मनाते हैं.

मैं भी कल ऐसी हे किसी शोक सभा मैं बैठा मिलूँगा. आज सोंचा चलो जब ईद , दिवाली, दसहरा आप सब के साथ मिल के मनाते हैं तो मुहर्रम क्या है और क्यों मनाते हैं यह भी बताता चलूँ. क्यों की इमाम हुसैन (ए.स) की क़ुरबानी और उनका ग़म किसी धर्म विशेष की जागीर नहीं है.

आज इमाम हुसैन (ए.स) की शहादत मुसलमानों का हर एक फिरका मनाता है. कोई उनकी सभा बुला के उनकी तारीफें करता मिल जाता है तो कोई काले कपडे पहन की फर्श ए अजा (शोक सभा) मिलेगा.

ज़ाहिरी तौर पे ऐसा दिखी देता है की जैसे यह मुसलमान अपने नबी के नवासे की शहादत का ग़म मना रहे हैं. लेकिन जब ध्यान से देखा तो पाया की दुनिया भर के सभी सत्यप्रेमी मानवता के पुजारियों ने हुसैन के बेजोड़ बलिदान को सराहा और श्रद्धांजलि अर्पित की है. कभी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को कहते पाया की "मैंने हुसैन से सीखा है अत्याचार पर विजय कैसे प्राप्त होती है तो कभी है तो कभी डॉ राजेंद्र प्रसाद को कहते पाया "शहादत ए इमाम हुसैन (अस) पूरे विश्व के लिए इंसानियत का पैग़ाम है. कभी डॉ . राधा कृष्णन को कहते पाया " इमाम हुसैन की शहादत १३०० साल पुरानी है लेकिन हुसैन आज भी इंसानों के दिलों पे राज करते हैं. रबिन्द्रनाथ टगोर ने कहा सत्य की जंग अहिंसा से कैसी जीती जा सकती है इसकी मिसाल इमाम हुसैन हैं. 

कितनी जगहों पर ग़ैर मुस्लिम भी इसको अपने रंग में मनाते हैं. मुहर्रम का चाँद देखते ही , ना सिर्फ मुसलमानों के दिल और आँखें ग़म ऐ हुसैन से छलक उठती हैं , बल्कि हिन्दुओं की बड़ी बड़ी शख्सियतें भी बारगाहे हुस्सैनी में ख़ेराज ए अक़ीदत पेश किये बग़ैर नहीं रहतीं.

ऐसा क्यों है यह समझने के लिए कर्बला क्यों हुई और कर्बला मैं क्या हुआ था इसको समझना आवश्यक है. 

हज़रत मुहम्मद (स.अव) की शहादत के बाद , इस्लाम के कानून मैं बादशाहत के असरात दिखाई देने लगे , और मुसलमानों के खलीफा हज़रत अली (ए.स), जो की हज़रत मुहम्मद (स.ए.व) के दामाद भी थे उनको माबिया ने, जो बनी उमय्या का एक सरदार और प्रभावशाली व्यक्ति था, की बग़ावत का शिकार होना पड़ा और शहीद कर दिए गए.

उनके बाद खिलाफत माबिया के हाथ मैं आ गयी. हज़रत इमाम हसन जो हज़रत अली (ए.स) के बड़े बेटे थे उनको भी माबिया ने ज़हर दे के शहीद कर दिया गया . अपनी ज़िंदगी मैं माबिया ने अपने ज़ालिम और दहशतगर्द बेटे यज़ीद को खलीफा बना दिया , जिसका चरित्र नितान्त दोष युक्त था. इस्लाम मे जो हराम था उसको हलाल करने की कवायद शुरू हो चुकी थी, सरकारी खज़ाना अपने फायेदे के लिए इस्तेमाल होने लगा था. जब लोगों ने आवाज़ उठाई इस फैसले के खिलाफ तो पैसे और अत्याचार से उनकी ज़बानें बंद करवा दी गईं.

माबिया के मरने के बाद यजीद और बेलगाम हो गया और उसने हज़रत अली (ए.स) के बेटे इमाम हुसैन (ए.स) से कहा की वोह उसे अपना धार्मिक गुरु या पेशवा मान लें वरना मरने के लिए तैयार हो जाएं.

इमाम हुसैन ने समझ लिया कि इस्लाम और सच्चाई को बचाने के लिए उन्हें जान तो देना है मगर इस तरह की दुनिया को स्पष्ट मालूम हो कि हुसैन ने क्यों जान दी ? और उनके दुश्मनों ने उन्हें क्यों मारा ? यानी सत्य और असत्य की जो लड़ाई संसार में सदैव से होती आयी है वह एक नये ढंग से लड़कर दिखाई जाय.

इमाम हुसैन ने परिस्थिति को देखकर मदीना छोड़ने का निश्चय कर लिया. हुसैन अपने घराने वालों के साथ मदीने से मक्का रवाना हुए. पहले वह मक्के गये मगर वहाँ भी यज़ीद के लोग मौजूद थे जो चाहते थे कि हज के अवसर पर चुपके से इमाम हुसैन को मार डालें और अपराध किसी और , के सिर मढ़ दिया जाये. मगर हुसैन तो यह चाहते थे कि जान इस तरह दें कि दुनिया को अच्छी तरह मालूँम हो जाय कि हुसैन ने क्यों जान दी, और किसने उनको मारा ? इसलिए आप हज किये बिना ईराक की तरफ़ रवाना हो गये. ये छोटा सा क़ाफ़िला अरब की गर्मी की कठिन यात्रा के दुख झेलता हुआ चला जा रहा था. हर मंज़िल पर लोग हुसैन से आग्रह करते थे कि ख़ुदा के लिए वापिस चले जाइये, यज़ीद की शक्ति बहुत बड़ी है और उनकी सहस्त्रों की संख्या में सेनाएँ जमा हो रही हैं. मगर हुसैन मुहम्मद के नवासे और अली के बेटे थे, जिन्होने ख़ुदा के बताए रास्ते पर चलने के लिए हमेशा ख़ुशी-ख़ुशी दुख झेला था, वे अपने इरादे में अटल रहे और यात्रा की कठनाइयाँ सहन करते हुए कूफा की तरफ आगे बढ़ते रहे.

रास्ते मैं यजीद की फ़ौज का सेनापति हुर्र मिला जिसने इमाम हुसैन (ए.स) को कूफा जाने से रोका. इमाम हुसैन (ए.स) ने विरोध किया लेकिन फिर मजबूरन मान ना पड़ा और यह काफिला कर्बला की और चल पड़ा. इमाम हुसैन (ए.स) का किरदार देखिये की जो हुर्र ने उनका रास्ता बदल की यजीद की फ़ौज की तरफ ले जा रहा था, रस्ते मैं उसकी फ़ौज मैं पानी ख़त्म हो गया तो इमाम हुसैन ने उन सभी को पानी पिलाया यहाँ तक की उस फ़ौज के जानवरों को भी सैराब किया.’

मुहर्रम के महीने की 2 तारीख़ थी जब इमाम हुसैन का यह काफिला कर्बला पहुंचा और नहर ए फुरात के किनारे अपने तम्बू लगा लिए.इमाम हुसैन के साथ सत्तर-बहत्तर आदमी थे और उनमें भी कुछ बहुत बूढ़े लोग थे और कुछ नयी उम्र के लड़के, चन्द जवान और नौजवान थे.

यजीद की फ़ौज ने इमाम के परिवार वालों का डेरा नहर के किनारे से हटवा दिया, जिस से उनको पानी ना मिल सके.

2 से 7 तक मुहर्रम तक इमाम हुसैन ,उनके भाई हज़रत अब्बास और उनके कुछ बुज़ुर्ग साथी यज़ीद की सेना के अधिकारियों से बात-चीत करते रहे, उन्हें समझाते रहे कि तुम क्यों निर्दोषों का ख़ून अपने सिर लेते हो. हुसैन ने यह भी कहा कि मुझे यज़ीद के पास ले चलो, मैं स्वंय उससे बात-चीत कर लूँगा. ये रिवायत भी है कि उन्होने ने कहा, मैं किसी और देश, हिन्दुस्तान की ओर चला जाना चाहता हूँ जहाँ मुसलमान तो नहीं लेकिन इंसान रहते हैं . मगर इन अधिकारियों को सख़्ती से यह आदेश दिया गया था कि या हुसैन और उनके परिवार को कहीं ना जाने दिया जाए.

7 मुहर्रम से यज़ीद की फौजों ने नदी पर पहरा बिठा दिया और हुसैन की फौजों तक पानी का पहुँचना बन्द हो गया और खाद्य-सामग्री के रास्तों की नाका बंदी कर दी गयी. वह समझते थे कि हुसैन और उनके साथी अगर और किसी तरह से नहीं दब सकते तो नन्हें बच्चों और औरतों की भूख प्यास तो उनको झुका ही देगी।.मगर वे क्या जानते थे कि हुसैन का सिर कट सकता है, अत्याचार और झूठ के सामने झुक नहीं सकता.

फिर मुहर्रम की रात आगयी जब यह तै हो गया की यजीद के तीस हज़ार के लश्कर से हुसैन (ए.स) के ७२ की जंग होगी.

इमाम हुसैन (ए.स) ने रात मैं रौशनी बुझा दी और अपने साथियों से इमाम ने कहा "मैं किसी के साथियो को अपने साथियो से ज़्यादा वफादार और बेहतर नहीं समझता कल का दिन हमारे और इन दुश्मनो के मुकाबले का है मैं तुम सब को बखुशी इजाज़त देता हूँ की रात के अंधेरे मे यहा से चले जाओ मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं होगी, यह लोग सिर्फ मेरे खून के प्यासे है,यजीद के फौजी उसको जाने भी देंगे जो मेरा साथ छोड़ के जाना चाहेगा. कुछ समय बाद रौशनी फिर से कर दी गयी और देखा की एक भी साथी इमाम हुसैन का उनका साथ छोड़ के नहीं गया. इतिहास साढ़े तेरह सौ वर्ष से इस पर चकित है की इमाम हुसैन (ए.स) मैं ऐसा क्या था की आज्ञा देने के बाद भी कोई उनका साथ छोड़ के नहीं गया. उस से भी अधिक आश्चर्य की बात यह की जो हुर्र यजीद का सेनापति था, जिसने हुसैन का रास्ता कूफा से कर्बला की और मोड़ा था, जिसने इमाम पे पानी ७ मुहर्रम से बंद कर दिया था , उसी शाम अँधेरे मैं इमाम हुसैन (ए.स) के पास आ गया और क़ुरबानी देने की इजाज़त मांगी.

जावेद बदायुनी ने कहा :
दिल की आवाज़ भी है ज़हन की परवाज़ भी है 
“हुर्र ”! यह हिजरत तेरा अंजाम भी आग़ाज़ भी है 
लाश .ए “अब्बास ” पे रो रो के वफाओं ने कहा 
तेरे मरने पे हमें रुंज भी है नाज़ भी है 
१० मुहर्रम की सुबह आये, सभी नमाज़ मैं खड़े हो गए, लश्कर के यजीद की तरफ से तीरों की वर्षा होना शुरू हो गयी और ३० लोग नमाज़ पढ़ते मैं ही शहीद हो गए.

फिर जंग मैं यजीद की फ़ौज ले लड़ने एक एक कर के लोग जाते रहे . सबसे पहले हुसैन के साथियों ने लड़ाई में जान क़ुर्बान की, जिसमें इमाम के बूढ़े दोस्त हबीब इब्ने मज़ाहिर और जनाब ए हुर्र भी थे.

फिर इमाम हुसैन के रिश्तेदारों की बरी आयी. जिसमें इमाम का भतीजा कासिम और भांजे ऑन ओ मुहम्मद , भाई हज़रत अब्बास (लश्कर के सेनापानी) , बेटा अली अकबर भी थे.

उनकी माएं अपने बेटों को सजा के , सिपाही की तरह भेजती थीं और बाद शहादत ५७(56 साल 5 महीने और 5 दिन) साल के भूखे प्यासे इमाम हुसैन (ए.स) ,सभी को लेके खेमे (तम्बू) मैं ले आते थे.इनमें से किसी का भी जिस्म पूरा ना आया खेमे मैं.

अपने बेटे, भाई, भतीजों के लाशे देखे के औरतें रोती और मातम करती थीं और दूसरे बेटे को शहीद होने के लिए तैयार किया करती थी.

जब सब शहीद हो गए तो इमाम हुसैन (ए.स) ने फ़ौज ए यजीद से कहा, तुम्हारा मुजरिम मैं हूँ, मेरा बेटा ६ महीने का है, प्यासा है, एक काम करो इसको पानी दे दो , चाहे बाद मैं मुझे मार देना. पानी के सवाल पर यज़ीदी-सेना ने तीर बरसाये। बच्चे की गरदन पर तीर बैठा और वह बाप के हाथों में ख़त्म हो गया.

अब इमाम हुसैन (ए.स) और उनके बड़े बेटे इमाम सज्जाद ही बचे थे. इमाम सज्जाद बीमार थे और बेहोश थे. इमाम हुसैन (ए.स) ने बेटे सज्जाद को हिलाया और कहा बेटा सब शहीद हो चुके, तुममें जंग करने की ताक़त नहीं, अब मैं जाता हूँ शहीद होने ऐ बेटा परेशानिओ का सामना करते करते जब कभी मदीना पहुचना तो सब से नाना जान ( मोहम्मद साहब) के रौजे (कब्र) पर जाना, मेरा सलाम कहना और सारा आंखो देखा हाल सुनना, फिर मेरी माँ सय्यदा फातिमा की कब्र पर जाना और मेरा सलाम कहना फिर मेरे भाई हज़रत हसन की कब्र पर जाना और मेरा सलाम कहना,, मेरे बाद तुम ही मेरे जाँ नशीन हो !! 

इसके बाद इमाम हुसैन ने अपना साफा ( पगड़ी ) इमाम जाइनुल आबीदीन को पहनाया और वापस बिस्तर पर लिटा दिया.

इमाम हुसैन (ए.स) ने अपना रुख मैदान ए जंग की तरफ किया. जंग के पहले अल्लाह से दुआ की और इसके बाद इमाम हुसैन ने याजीदी फौज को मुखातिब करते हुए कहा कि बताओ तुम लोग मेरे खून के प्यासे क्यो हो, क्या मैंने किसी को कत्ल किया ? या किसी का माल बर्बाद किया ? या किसी को ज़ख्मी किया जिसका तुम मुझ से बदला लेना चाहते हो ,,

इन बातों का याजीदी फौज के पास कोई जवाब न था ! जब फ़ौज ने कुछ ना सुना इमाम हुसैन (ए.स) ने भी जंग शुरू की और लश्कर ए यजीद से जंग करते रहे . उनके जिस्म पे इतने तीर लगे थे की जब शाम(असर) का वक़्त होने को आया, इमाम हुसैन (ए.स) ने नमाज़ के लिए घोड़े से उतेरना चाहा तो उनका शरीर ज़मीं पे ना आया बल्कि तीरों पे टिका रहा.इमाम ने सजदे मैं सर को झुकाया . शिमर ने प्यासा , इमाम के गले पे कुंद खाजेर चला के सर अलग किया, जश्न मनाया जाने लगा.

इस तरह करबला की यह छोटी सी बस्ती जो २ मुहर्रम को बसी थी 10 मुहर्रम को उजड़ गयी.

इमाम के खेमे मैं आग लगा दी गयी, शहीदों के सिर काट लिए कि यज़ीद को पेश करेंगे और इनाम लेंगे. औरतों बच्चों और बीमार इमाम सजाद को ज़ंजीर, हथकड़ी और बेदी पहना के कोड़े मारते १६०० किलोमीटर दमिश्क़ तक, जो यज़ीद की राजधानी थी, ले गये और वहाँ क़ैद कर दिया गया.

जावेद बदायुनी ने कहा :
जलते खेमों पे अदू खुश है उसे क्या मालूम 
यह धुवां जंग का अंजाम भी आग़ाज़ भी है 

यह इतिहास की ऐसी शोकपूर्ण घटना है कि जिसकी यादें साढ़े तेरह सौ वर्ष से मुसलमान और ग़ैर मुसलमान सभी मनाते हैं. बिहार,उडीसाऔर उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर हिंदू ताज़िए के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं. बिहार के सिवान ज़िले के हसनपुरा गाँव के नानकशाही मठ से पिछले तीन सौ वर्षों से ताज़िया जुलूस निकाला जाता है जहाँ आज महंत रामदास पूरी श्रद्धा के साथ ताज़िए को कंधा देते हैं .हमारे ब्लोगर भाई सिद्धार्थ त्रिपाठी ने अपने गाँव मैं ताज़िया मेले का विवरण अच्छे अंदाज़ मैं दिया है. "और बड़वानी जिले के राजपुर में तहसील मुख्यालय पर पचास से अधिक वर्षों से ताजिए बना रहे गरीब हिन्दू परिवारों ने यह संदेश दिया है कि गम का रिश्ता किसी कौम विशेष से नहीं है।

मुंशी प्रेमचंद जी ने किसी समय हजरत इमाम हुसैन की शहादत से प्रभावित होकर "कर्बला" नाटक लिखा था। उन्होंने इसमें ऐतिहासिक तथ्य दिया था कि कर्बला की लड़ाई में कुछ हिन्दू योद्धाओं ने भी हजरत हुसैन के पक्ष में युद्ध कर प्राणोत्सर्ग किया था.

बहुत ही मशहूर है की हिन्द से एक ब्राह्मण जिनका नाम रहिब दत्त था इमाम हुसैन की तरफ से याजीदियों से लड़े थे और हिंदी रतनसेन का किस्सा भी बहुत मशहूर है जो फिर कभी बात चली तो बताऊंगा .

शायद इसी लिए हज़रत मुहम्मद (स.अव) साहब कहा करते थे" “हिंद से मुझे मुहब्बत की खुशबू आती है”

इमाम हुसैन ने शहादत दे के पूरी दुनिया तो यह पैगाम दिया है की ज़ुल्म और ज़बरदस्ती के आगे किसी भी हाल मे झुकना नहीं चाहिए, सच्चाई और ईमानदारी के लिए हमेशा कुरबानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए. आज दुनिया मे १३७० साल से हर साल इमाम हुसैन (ए.स) की क़ुरबानी याद करके आज भी लोग रोते है जबकि याजीद का नाम लेवा कोई नहीं है.
आज अगर इंसानियत, बन्दगी, दोस्ती, दूसरों की ख़िदमत, कमज़ोरों की मदद , मज़लूमों की तरफ़दारी ,समाज मैं अमन और शांति का जज़्बा हम में पाया जाता है तो यह सब इमाम हुसैन (अ) की क़ुर्बनिओन का नतीजा है.

विश्व का कोई भी ऐसा देश नही है, जहां हुसैन के त्याग व बलिदान की याद न की जाती हो। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई श्रद्धा के साथ हुसैन का नाम लेता है.

SOCIOPOLITICAL CONDITION  - BHUVAN JOSHI

MUST READ : AN IMPORTANT ARTICLE DISCUSSING THE SOCIOPOLITICAL CONDITION OF OUR COUNTRY.

"Our beloved country, India is rich in natural resources, sujal, sufal, jungles, minerals, fuel as coal etc. and most important of them is intelligent & diligent people who have achieved success in every field whenever the opportunity arise. But, our economic system has converted these resources & people into slaves of corporate & their bosses. Even, more & more peasantry is coming under the enslavement of these corporate. All the parliamentary parties, Govt. & executive are working as extension or political department of these corporate. Let alone the other natural resources i.e. 2G/3G spectrum, coal, mineral etc. which are properties of people of India and PSUs created with the wealth of people, the essentials of life like water, electricity are being handed over to these corporate who may be non-producers as in the case of electricity & they have become the monopoly supplier of electricity and fleecing the people at their will.

The corporate regime itself is corrupt. For example, if a personal produces a thing i.e. commodity or service; with his labour & sells it in the market, he gets the full value in exchange but if he produces the same thing after being hired by employer (around this the whole corporate system operates), he will only get his wages & rest of the value is kept by employer. Thus, this is the, the value of labour snatched from labour, is the profit of employer, now a-days corporate in main. Besides this these corporate creates monopolies to decide the value of product at their will.

Thus, fleecing the people in two ways; first by paying less as wages & second by selling their produce at higher prices. This loot is legalised by the law. But they even do not follow the laws & rules framed with their suggestion itself. All the parliamentary parties whether in Govt. Or opposition either receives funds from these corporate or spend their money in election to amass illegal wealth as bribe or embezzlement of public money. The constitution of India has been kept in selves to appease these corporate & these parties many a times indulge in un-constitutional activities yet they are the recognised by election commission. Thus, they act as brokers of corporate.

Now, let’s have a look at the electoral system, the basis of democracy. Everybody knows that crores of rupees are spent by candidates for elections. How many people in India can spend the amount in crores for them or their supported candidates? The Finance Minister in his budget speech said appx. 30,000 people have income over Rs. 1 crore. Let’s be more liberal & enhance our estimate to 2 lakhs. What we find? There are almost the entire population barring this minuscule minority of 2 lakhs who are only eligible to elect others as candidates & other 2 lakhs who are only eligible to get elected. What a democracy it is!!!

In both the fields, political & economical, financial oligarchy has established monopoly thus `loktantra` has become `dhantantra`. But to hide all this, they use the veil of democracy because in to-days world it is impossible to rule under naked dictatorship of corporate. So, there is drama of elections but during these elections, they don’t raise peoples issues rather they raise non-issues like secularism, communalism, corruption, chauvinism etc. & distract people from the real issues.

The result is in normal times people see all these parties with no hope & outsider them outsiders and are always looking for an alternative. But, during the time of election with frivolous issues & frivolous alignments e.g. Janata Party, Janata dal, NDA, UPA, third front Govts.; the people fall prey to their designs and are befooled. Now, with the upcoming election these corporate agent parties are releasing political advertisements just to hoodwink the people. So, it’s time people understand the character & nature of these corporate agent political parties & searching alternative avenues.

The alternative people’s agenda may be for living as ‘human-being’ not as ‘customers’ i.e. being useful if you money in pocket. So, the basic demands may be:-
1) universal education on the basis equal education policy,
2) universal equal health facilities,
3) employment to all according to qualification &
4) minimum wages to be based on necessities of life.
These demands are well with-in the ambit of `directive principles` & rights conferred upon on every citizen of India in `preamble` of Constitution on India."

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Tuesday, 29 October 2013

कट्टरता की इबारत - खुर्शीद अनवर


जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2013 : वहाबी इस्लाम सऊदी अरब सरकार की राजनीतिक विचारधारा है। पूरे स्कूली पाठ्यक्रम में इस विचारधारा का प्रचार शामिल है। सऊदी अरब में पब्लिक स्कूलों की संख्या लगभग पच्चीस हजार है,

जिनमें पचास लाख से ऊपर छात्र शिक्षा ग्रहण करते हैं। फारूक मस्जिद, टेक्सास (अमेरिका) से बरामद एक दसवीं कक्षा की किताब ‘साइंस ऑफ तौहीद’ में दर्ज है कि गैर-मुसलिमों या गैर-वहाबी मुसलिमों के साथ रहना इस्लाम के खिलाफ है। इसीलिए अल्लाह का हुक्म है कि सिर्फ मुसलमानों (वहाबी मुसलमानों) के दरमियान उठो-बैठो। यह तो महज झलक है। जरा सऊदी अरब के शिक्षा मंत्रालय द्वारा स्वीकृत वहां पाठ्यक्रम में मौजूद कुछ उदाहरणों को देखें तो तस्वीर और साफ हो जाएगी।

‘‘मुसलमान जो अंतर्धार्मिक संवाद में पड़ते हैं उनको भी अधार्मिक मानना चाहिए। सूफी और शिया आस्था को भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए। जो मुसलिम कोई और धर्म अपना ले उसे कत्ल कर दिया जाना चाहिए। एक मुसलमान के लिए जायज है कि उसका खून बहा दे और उसकी संपत्ति पर कब्जा कर ले।’’

‘‘जो सुन्नी मुसलिम वहाबी विचारधारा में विश्वास नहीं रखते उनकी भर्त्सना करनी चाहिए और उन्हें हेय दृष्टि से देखना चाहिए और उनको बहु-ईश्वरवादी नस्ल की पैदावार मानना चाहिए। मुसलमानों पर जोर डालो कि ईसाई, यहूदी, बहु-ईश्वरवादी, और गैर-वहाबी मुसलिमों समेत तमाम अनास्था वालों से नफरत करनी चाहिए। न तो किसी गैर-मुसलिम या वहाबी आस्था में विश्वास न रखने वाले मुसलिम से मेलजोल करो न ही आदर दिखाओ।’’

‘‘जिहाद के जरिए इस्लाम फैलाना ‘मजहबी फर्ज’ है। एक सच्चे मुसलमान का फर्ज है कि अल्लाह के नाम पर जिहाद के लिए तैयार रहे। तमाम नागरिकों और सरकार का भी यही फर्ज है। सैन्य प्रशिक्षण आस्था में निहित है और इसे लागू किया जाना चाहिए। जंग के लिए असलहे रखना जरूरी है। बेहतर तो यह हो कि विशिष्ट सैन्य वाहन, टैंक, रॉकेट, लड़ाकू विमान और वे अन्य सामान जो आधुनिक युद्ध में जरूरी होते हैं उनकी फैक्ट्रियां लगाई जाएं।’’

जरा नजर डालिए कि प्राथमिक शिक्षा में जिन बच्चों को पढ़ाया जाए कि ‘इस्लाम (वहाबी) के अलावा हर धर्म गलत रास्ते पर है। और फिर इम्तिहान में सवाल हो, रिक्त स्थान की पूर्ति करें ‘‘.... के अलावा हर धर्म गलत रास्ते पर है। जो मुसलमान नहीं है वह मरने के बाद ... में जाएगा।’’ जाहिर है कि पहले इन बच्चों को गैर-इस्लामी कौन है यह बताया जा चुका है। इसमें गैर-वहाबी सुन्नी, शिया समेत तमाम धर्म शामिल हैं।

एक मार्च, 2002 को ऐन-अल-यकीन नामक पत्रिका ने ऑनलाइन सऊदी अरब के राजशाही परिवार के वहाबियत को दुनिया भर में फैलाने के शैक्षणिक कार्यक्रम के बारे में रिपोर्ट दी। इसमें बताया गया कि किंग फहद अरबों सऊदी रियाल वहाबी इस्लामी संस्थानों और इस विचारधारा की शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। सऊदी अरब से बाहर पश्चिमी देशों में 210 इस्लामी केंद्र, 500 मस्जिदें, 202 कॉलेज और 2000 स्कूल एशिया, ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अमेरिका में इन्हीं पाठ्यक्रमों के साथ खोले हैं, जिनमें वही शिक्षा दी जाएगी जो सऊदी अरब के पब्लिक स्कूलों में दी जाती है। मतलब जिहादी शिक्षा, नफरत की शिक्षा, आतंकी शिक्षा।

ऐन-अल-यकीन ने जो देश गिनाए उनमें दक्षिण एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका सहित अस्सी देशों का जिक्र है। सऊदी अरब में तो वहाबियत राजनीतिक विचारधारा ही है और राष्ट्र एक वहाबी राष्ट्र, लेकिन इसका नासूर दुनिया भर में फैले इसके लिए मदीना स्थित इस्लामी विश्वविद्यालय में पचासी सीटें विदेशी छात्रों के लिए आरक्षित हैं और इसमें लगभग एक सौ चालीस देशों के पांच हजार छात्र पंजीकृत हैं।

सऊदी अरब के शिक्षामंत्री फैसल बिन अब्दुल्लाह बिन मोहम्मद अल सऊद ने जहरीली शिक्षा का राज फाश होने के बाद 2005 में पाठ्यक्रम में सुधार लाने की बात की, लेकिन आज तक इस पर कोई अमल नहीं हुआ। इतना ही नहीं, इसी वर्ष यानी 2005 में एक अध्यापक को यहूदियों, शिया मुसलिमों, गैर-वहाबी सुन्नियों को भी इंसान बताने के जुर्म में सार्वजनिक रूप से साढ़े सात सौ कोड़े और कैद की सजा हुई। बाद में अंतरराष्ट्रीय दबाव में कैद की सजा माफ की गई।

कौन-सी शिक्षा है यह? क्या मकसद है इस शिक्षा का? क्या बन रहे हैं यहां से तथाकथित शिक्षा प्राप्त करने वाले?

ईरान के प्रोफेसर मुर्तजा मुत्तरी के शब्दों में, इन वहाबियों को न इस्लाम की समझ है न कुरान की। लिहाजा इनका पूरा शिक्षाशास्त्र खूनी खेल ही सिखा सकता है। ‘‘वहाबियों का अकीदा है कि अल्लाह के दो पहलू हैं। पहला उसका तसव्वुर, जिसमें दाखिल होने की इजाजत किसी को नहीं। अल्लाह से वाबस्ता इबादत और तवस्सुल (अल्लाह तक पहुंचने का जरिया जैसे सुन्नी खलीफा या शिया इमामत) दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। तवस्सुल तक आकर वहाबियत बाकी इस्लाम से दूर हो जाती है।

यह कुरान के खिलाफ है कि आप खालिक (अल्लाह) और मखलूक (इंसान) में मखलूक की अजमत को न मानें। खुदा ने आदम के सामने फरिश्तों तक को सजदा करने को कहा और वहाबी उसे नकारते हैं। इस तरह से आप इंसान को अशरफ-उल-मख्लूकात (जीवों में सर्वश्रेष्ठ) से गिरा कर सिर्फ जानवर बना देते हैं। जो लोग इंसान की श्रेष्ठता को ही नकारते हैं उनसे उम्मीद करना कि इंसानी खून की कोई कीमत होगी, बेकार ही है।

नफरत फैलाने का दूसरा जरिया है अन्य इस्लामी मान्यताओं को खारिज करना। इसी शिक्षा के अनुसार मजारों और कब्रों पर जाना भी इस्लाम के खिलाफ है। पूरे सऊदी पाठ्यक्रम में शुरू से ही बच्चों को यह तालीम दी जाती है। इससे फौरन इस्लामी सिलसिले के तमाम गैर-वहाबी समुदाय इस्लाम से बाहर हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वहाबी ऐसा कदम उठा कर खुद कुरान को झुठलाते हैं।

सूरह अल-कहफ में साफ आया है कि ‘‘अल्लाह का वादा सच है यह बताने के लिए इमारत बनाओ’’ (कुरान 18:21)। ऐसी मान्यता है कि कयामत के दिन उसमें से ही मुर्दे निकल कर आएंगे। लेकिन इंसानियत के दुश्मन वहाबी मजारों पर जाने वालों को कत्ल करते हैं और मजार तोड़ने की बाकायदा मुहिम चला रहे हैं। शिया अपने इमामों के लिए जियारत (दर्शन) करने इराक, सऊदी अरब, ईरान सहित अन्य देश भी जाते हैं। सऊदी अरब में अब इस पर रोक लगा दी गई है।

पिछले कुछ वर्षों से वहाबियों ने सिलसिलेवार ढंग से सूफी संतों, शिया समुदाय, अहमदिया मुसलिम और गैर-वहाबी सुन्नी आस्था वाले प्रतीकों पर हमले शुरू किए। इनके हमले केवल इन प्रतीकों पर नहीं हुए, मक्का स्थित काबे के पीछे के हिस्से को भी इन्होंने ध्वस्त कर दिया। वहां पर बड़े-बड़े होटल और शॉपिंग मॉल बनाने शुरू किए। इनमें पेरिस हिल्टन का शॉपिंग मॉल मुख्य आकर्षण का केंद्र है। काबा के अलावा मदीना में इन्होंने मोहम्मद के परिवार और साथियों की मजारें और कब्रें तोड़नी शुरू कीं। इनमें मोहम्मद की बेटी फातिमा, अबू बकर और उमर की मजारें और मस्जिदें प्रमुख हैं।

सूफी मजारों पर हमले तमाम हदों को पार कर गए। माली में 333 सूफी संतों की मजारों वाले मशहूर स्थल को वहाबियों ने ध्वस्त कर दिया। 1988 में यूनेस्को से विश्व-धरोहर के रूप में मान्यता-प्राप्त सिद्दी याहिया मस्जिद भी इन वहाबी हमलों की भेंट चढ़ी। लीबिया में पचास सूफी मजारों को इन वहाबियों ने एक साथ उड़ा दिया। सोमालिया में शायद ही सूफी संतों का कोई मजार बचा हो जो अल-शबाब के हमलों का शिकार न हुआ हो। पाकिस्तान में बाबा फरीद, बाबा बुल्लेशाह, हजरत दाता गंजबख्श सहित अनेक मजारों पर लगातार वहाबी तालिबानी हमले हुए।

सऊदी अरब समर्थित ये हमले अल-कायदा और उसके सहयोगी संगठन अंजाम देते आए हैं। वहाबियत पूरी तरह से फासीवादी विचारधारा में ढल चुकी है जो इस धरती से मोहब्बत का नाम मिटा देना चाहती है। जरा एक नजर देखें कि वहाबियत का इस्लाम जो कर रहा है उसके बरक्स सूफी मत कैसा पैगाम दे रहा है।

निजामुद्दीन औलिया के बारे में मशहूर है कि बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने उनसे इस्लाम का प्रचार करने के लिए कश्मीर जाने को कहा। निजामुद्दीन का जवाब था कि मैं मोहब्बत का पैगाम देता हूं, मेरे लिए मुमकिन नहीं कि इस्लाम का प्रचार करने कश्मीर जाऊं। इसके बाद अलाउद्दीन ने अमीर खुसरो के जरिए निजामुद्दीन को दरबार तलब किया। निजामुद्दीन ने पैगाम भेजा कि जो सूफी सत्ता के नजदीक जाता है वह ईमान खो बैठता है। अलाउद्दीन ने कहलाया कि मैं खुद आ रहा हूं। निजामुद्दीन ने कहा, मेरी खानकाह में आने पर किसी को रोक नहीं, मगर मेरी खानकाह के दो दरवाजे हैं। जिस वक्त एक दरवाजे से बादशाह के कदम मेरी खानकाह में पड़ेंगे, उसी वक्त दूसरे दरवाजे से मैं निकल जाऊंगा।

बाबा बुल्ले शाह। मोहब्बत का पैगाम देने वाले इस सूफी को कौन नहीं जानता। जरा देखिए क्या है मजहब इनकी नजर में। ‘‘होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह/ नाम नबी की रतन चढ़ी, बूंद पड़ी इल्लल्लाह/ रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फना-फी-अल्लाह/ होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह/ अलस्तु बिरब्बिकुम पीतम बोले, सभ सखियां ने घूंघट खोले? कालू बला ही यूं कर बोले, ला-इलाहा-इल्लल्लाह/ होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह।’’

वारिस शाह की हीर आज भी मोहब्बत का पैगाम बनी हुई है। सितार की ईजाद करने वाले अमीर खुसरो फरमाते हैं: ‘‘काफिर-ए-इश्कम मुसलमानी मरा दरकार नीस्त/ हर रग-ए-मन तार गश्ता हाजत-ए-जुन्नार नीस्त’’ (इश्क का काफिर हूं मुसलमान होना मेरी जरूरत नहीं। मेरी हर रग तार बन चुकी है मुझे जनेऊ की भी जरूरत नहीं)।

वहाबी मत ने पिछले लगभग दो दशक में न सिर्फ मासूम इंसानों का खून बहाया है बल्कि मोहब्बत का भी खून किया है। इस महाद्वीप में निजामुद्दीन औलिया, मोइनुद्दीन चिश्ती, अमीर खुसरो, वारिस शाह, बुल्लेशाह, बाबा फरीद जैसे सूफी संतों ने धार्मिकता की कट्टर जंजीरें तोड़ते हुए सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत का पैगाम फैलाया था। वहाबी आंदोलन इन संतों की मजारों को रौंदता हुआ इनके मोहब्बत के पैगाम का भी गला घोंट रहा है। और इसके लिए सऊदी अरब बेपनाह धन खर्च कर रहा है।

जो देश अपने स्कूलों में नफरत की शिक्षा देगा, वहां से निकलने वाली विचारधारा और उस विचारधारा के वाहक ऐसे शिक्षा संस्थानों से निकलने वाले विद्यार्थी क्या गुल खिला सकते हैं इसका अंदाजा अफ्रीका, अरब देशों, दक्षिण एशिया और यहां तक कि पश्चिमी देशों में चल रहे खूनी खेल से लगाया जा सकता है। सऊदी अरब जैसे देश और दारुल उलूम जैसे शैक्षणिक संस्थानों का यह गठजोड़ आज सारी दुनिया को बारूद के ढेर पर बिठा चुका है। इससे पहले कि इस बारूद के ढेर को आग लगे, इन वहाबियों और इनकी विचारधारा को साकार रूप देने वाले अल-कायदा और उनके सहयोगी संगठनों का समूल नाश समय की मांग है।